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लेख-
अलविदा फकीर: सादगी, आक्रोश और जीवंतता के पर्याय नाना पाटेकर को श्रद्धांजलि….
सिनेमा का पर्दा आज भले ही खामोश हो गया हो, लेकिन उस पर अमिट छाप छोड़ने वाला वह जीवंत किरदार हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गया है। नाना पाटेकर सिर्फ एक नाम या अभिनेता भर नहीं थे, बल्कि वे शानदार सादगी से लबालब, निडर, बेबाक और हर संवाद में प्राण फूंक देने वाले एक ऐसे असाधारण व्यक्तित्व थे, जिनकी कमी कभी पूरी नहीं की जा सकती। उनका होना ही कला और इंसानियत के मंच पर एक जीवंत प्रेरणास्रोत होने का अहसास कराता था। वे जोश और खरोश की वह मूरत थे, जिन्हें जीवन की तमाम विषम परिस्थितियों ने अंदर तक झंझोड़ा, लेकिन उन्होंने हर बार उस हर झंझावात को अपनी ताकत बना लिया।
उनके भीतर जो गुस्सा था, वह किसी बनावटी मंचीय कला का हिस्सा नहीं था; वह उस सड़े-गले सिस्टम और व्यवस्था के खिलाफ सुलगता हुआ पवित्र आक्रोश था, जो आम इंसान की उम्मीदों को कुचलता है। वे व्यवस्था की खामियों पर खुलकर प्रहार करते थे, पर उसी पर्दे के पीछे उनका एक ऐसा मस्त फकीराना अंदाज भी था, जो अपनी ही धुन में और अपनी मस्ती में गाफील होकर खुद में ही खो जाने वाला फकीर जैसा था। उन्हें न तो चकाचौंध से मोह था और न ही सत्ता या शोहरत की भूख। वे सिनेमा की चकाचौंध से दूर, जमीन से जुड़े एक सच्चे इंसान थे, जिन्होंने परदे के बाहर भी ‘नाम फाउंडेशन’ जैसी संस्थाओं के माध्यम से सूखा पीड़ित किसानों और जरूरतमंदों के आंसू पोछकर अपनी संवेदनशीलता का असली प्रमाण दिया।
आज जब वे भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं रहे, तो ऐसा लगता है मानों अभिनय और बेबाक सच का एक पूरा युग थम गया हो। उनकी सादगी, उनका वह गूंजता हुआ स्वर और सिस्टम के खिलाफ खड़ा होने वाला वह निर्भीक तेवर हमेशा हमारी स्मृतियों में जिंदा रहेगा। वे सिखा गए कि जीवन को किस तरह पूरी शान, स्वाभिमान और फकीरी अंदाज से जिया जाता है। एक सच्चे इंसान और महान कलाकार को हमारी विनम्र और अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि!

मदन वर्मा “माणिक”
इंदौर, मध्यप्रदेश
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