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कविता –
चले आओ खुद
कदमों को संभाल के…!
—-
मैं चाहता हूँ, संगठन चलता रहे,
वफ़ादारी की रहनुमाई जारी रहे।
फ़िक्र करते हैं जो, बैठो पास ज़रा,
घर उनका—ज़िंदगी जी रहे वे भी।
सक्रिय हैं वे, तुमको चलाने वाले,
तुम उन्हें छोड़कर मुँह मोड़ गए हो।
जो सींचते थे संगठन को अब भी,
क्या तुम किसी और डगर चल पड़े?
मौके-दर-मौके हम साथ चलते रहे,
पकड़े हुए हाथ, अब तुम्हें देखते हैं।
हर मौका-ए-दस्तूर बार-बार आए,
इकट्ठे हों हम-तुम, साथ रहे ज़माना।
हम देखते हैं रस्ता, नज़रें उठा-उठा के,
चले आओ खुद कदमों को संभाल के।।
– मदन वर्मा “माणिक”
इंदौर, मध्यप्रदेश
दिनांक 08.08.2026
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