कविता
बादल-बिजली-पानी
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बादल ओ बिजली पूर्वी
हवाऐं हमें ना तरसाऐं,
खबर सुनाओं कब नाचेगा मोर,
आएगा पानी, गुड़गुड़ धानी,
कित्ता-कित्ता पानी, गाऐंगे बच्चे,
इत्ता-इत्ता पानी, गुड़गुड़ धानी,
मोसंबा भई, मोसंबा,
चाय का प्याला मोसंबा,
जिसने मेरी घडी़ चुराई,
उसको जेल में जाना होगा,
चंदा मामा दूर के, पोये पकाये पूर के,
आप खाए थाली में मुन्ने को दें प्याली में,
अटकन मटकन दईं चटोका,
फूल फूल की पांखडी़,
राजा गया दिल्ली,
दिल्ली से लाया बिल्ली,
धरती भी प्यासी, पानी को तरसे,
निष्ठूर हे बदली, अब तक न बरसी,
झमाझम को तरसी आंखें दुलारी,
सावन हरियाला मधुवन को हरषे,
बिन बरखा, सब लोग हुए बैचेन,
किसान भी चिंतित भरे उनके नैन,
बादल ओ बिजली , नियत तुम्हारी,
क्यों बदली सारी, क्यों बदली सारी,
झील सी अँखियां, सूखे हमारी,
बीत रहा मौसम, सूखी धरती,
आकाश निहारे, जालिम तिहारे,
बदली अब तो आजा,
तेरी राह निहारे,
नदी, ताल, तलैया,
सब तेरी लेंहै बलइयां।।
सुन जा रे हवाऐं,
सुन जा रे घटाऐं,
धरती को आज प्रणाम कर ले,
राम जाने वो घडी़ कब आएगी,
सूखी धरती का खत्म होगा क्रंदन,
पानी की होगी बौछार,
गिरेगा पानी मूसलाधार रे,
खत्म होगी, सबकी प्यास रे,
फिर गायेंगे सब मिल के,
इत्ता-इत्ता पानी, इत्ता-इत्ता पानी,
गुड़गुड़ धानी, गुड़गुड़ धानी।।
– मदन वर्मा ” माणिक ”
इंदौर, मध्यप्रदेश
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