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… मीसा (MISA) कानून के तहत 1.1 लाख से ज्यादा लोग बिना मुकदमे बंद हुये….
25 जून 1975 की रात 1 सफदरजंग रोड पर गाड़ियों का जमावड़ा था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे संविधान के पन्ने पलट रहे थे और निजी सचिव आर. के. धवन फोन पर गिरफ्तारियों की सूची अंतिम रूप दे रहे थे।
आधी रात के बाद राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने अनुच्छेद 352 के तहत ‘आंतरिक अशांति’ के नाम पर दस्तखत किए। कुलदीप नैयर ने अपनी किताब Emergency Retold में लिखा कि कैबिनेट की बैठक तो बाद में औपचारिक रूप से हुई, फैसला पहले ही लिया जा चुका था।
सुबह अखबारों में खाली जगहें थीं, रेडियो पर सिर्फ सरकारी भोंपू बज रहा था और विपक्ष के तमाम बड़े नेता सलाखों के पीछे थे।
लेकिन वह रात अचानक नहीं आई थी। 1971 के बांग्लादेश युद्ध में पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों का सरेंडर कराने वाली और ‘गरीबी हटाओ’ के नारे से अटूट दिखने वाली इंदिरा गांधी की सत्ता 1973 के अरब-इजरायल युद्ध के बाद हिलने लगी।
देश में खुदरा महंगाई 20% तक पहुंच गई, खाने-पीने की चीजें महंगी हुईं, बेरोजगारी बढ़ी। गुजरात का ‘नवनिर्माण आंदोलन’ बढ़ा तो चिमनभाई पटेल की सरकार गिरी।
बिहार में छात्रों के आंदोलन से निकले जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया। रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि जेपी पर जनसंघ, समाजवादियों और गांधीवादियों सबका भरोसा था।
मई 1974 में जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में 17 लाख रेल कर्मचारियों की हड़ताल ने प्रशासनिक मशीनरी की नींव हिला दी, जिसका जिक्र विनोद मेहता ने The Sanjay Story में किया है।
12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने रायबरेली से इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर 6 साल का प्रतिबंध लगा दिया। 24 जून को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी. आर. कृष्ण अय्यर से केवल सशर्त अंतरिम राहत मिली।
25 जून की शाम दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी, मोरारजी देसाई, राज नारायण और नानाजी देशमुख मंच पर थे। जेपी ने रामधारी सिंह दिनकर की पंक्ति “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” दोहराई और पुलिस व सेना से अपील की कि वे गैर-कानूनी आदेश न मानें।
जेपी इसे सत्याग्रह मानते थे, लेकिन सरकार ने इसे सेना में बगावत का खतरा बताया। उस रात जेपी, मोरारजी, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी सब जेल में डाल दिए गए।
मीसा (MISA) कानून के तहत 1.1 लाख से ज्यादा लोग बिना मुकदमे बंद हुए। सूचना मंत्रालय के सेंसरशिप आदेशों के खिलाफ Indian Express ने संपादकीय खाली छोड़ा और Financial Express ने टैगोर की कविता “Where the Mind is Without Fear” छापी।
लेकिन ज्यादातर मीडिया झुक गया, जिस पर कुलदीप नैयर ने लिखा—”जब उनसे झुकने को कहा गया, तो वे रेंगने लगे।”
अदालतों का पतन 1976 के ADM जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामले में दिखा, जहां 5 में से 4 जजों ने माना कि आपातकाल में नागरिक को जीने का अधिकार भी नहीं है।
अकेले जस्टिस एच. आर. खन्ना ने असहमति जताई और अपनी वरिष्ठता की कीमत चुकाई, जिसे इतिहासकार ग्रेनविल ऑस्टिन ने न्यायपालिका का सबसे साहसी पल कहा। उधर बिना किसी संवैधानिक पद के संजय गांधी के 5-सूत्री कार्यक्रम के तहत 80 लाख से अधिक जबरन नसबंदियां हुईं।
मार्क टली के मुताबिक उत्तर भारत के गांवों में जीप देखते ही लोग खेतों में भागते थे। अप्रैल 1976 में दिल्ली के तुर्कमान गेट पर बुलडोजर चले और शाह आयोग के अनुसार प्रशासन ने अत्यधिक बल प्रयोग किया।
इस दौर में राजनीति के अजीब रंग भी दिखे। सीपीआई (CPI), शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे और ओशो ने आपातकाल का समर्थन किया। विनोबा भावे ने इसे ‘अनुशासन पर्व’ कहा। लेकिन जब जनवरी 1977 में चुनाव हुए, तो उत्तर भारत से कांग्रेस का सफाया हो गया।
इंदिरा और संजय दोनों हारे, पहली बार गैर-कांग्रेसी जनता पार्टी सरकार बनी। 1978 में 44वें संविधान संशोधन से ‘आंतरिक अशांति’ हटाकर ‘सशस्त्र विद्रोह’ शब्द जोड़ा गया।
बिपन चंद्र इसे बड़ा संस्थागत संकट और रामचंद्र गुहा लोकतंत्र की सबसे अंधेरी रात कहते हैं। पर विडंबना यह रही कि 1980 में जनता ने इंदिरा गांधी को फिर सत्ता सौंप दी।
अब सवाल यह है कि क्या आज हम उसी इतिहास के एक नए, चकाचौंध भरे और अघोषित संस्करण में नहीं जी रहे हैं?
आज कोई लिखित सेंसरशिप नहीं है, लेकिन मीडिया को सरकारी विज्ञापनों के खरबों रुपये और कॉर्पोरेट दबाव से नियंत्रित किया जा रहा है।
1975 में 1.1 लाख लोग जेल गए थे, लेकिन आज NCRB के आंकड़े बताते हैं कि 2018 से 2022 के बीच कठोर कानून UAPA के तहत दर्ज 5,000 से अधिक मामलों में दोषसिद्धि (Conviction Rate) 3% से भी कम है। यानी 97% लोगों को सालों-साल बिना साबित जुर्म के जेल में सड़ाया गया।
क्या यह न्यायपालिका का modern-day ADM जबलपुर जैसा रुख नहीं है?
1973 में महंगाई 20% थी तो विपक्ष सड़कों पर था। आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद देश में एलपीजी ₹900 के पार है। केंद्र सरकार का कुल कर्ज 2014 के ₹55 लाख करोड़ से बढ़कर 2026 में ₹185 लाख करोड़ के पार पहुंच गया है।
जिस देश में 80 करोड़ लोग 5 किलो मुफ्त राशन की कतार में खड़े हों, उसे विकास का ‘विश्वगुरु’ मॉडल कहना अर्थव्यवस्था के साथ सबसे बड़ा मजाक है।
चुनावी शुचिता की बात करें तो ADR की रिपोर्ट के अनुसार रद्द किए गए ‘इलेक्टोरल बॉन्ड’ के ₹16,500 करोड़ के कुल चंदे में से आधी से ज्यादा रकम यानी ₹8,250 करोड़ से अधिक अकेले सत्ताधारी दल के खाते में गई।
कैग (CAG) की रिपोर्ट ने द्वारका एक्सप्रेसवे के निर्माण की लागत ₹18 करोड़ प्रति किलोमीटर से बढ़ाकर ₹250 करोड़ प्रति किलोमीटर करने पर सवाल उठाए थे, लेकिन टीवी डिबेट्स में आज भी ‘ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा’ का शोर जारी है।
1975 में ओशो और बाल ठाकरे ने अनुशासन के नाम पर तानाशाही का बचाव किया था, आज भी दरबारी बुद्धिजीवी और कुछ उद्योगपति हर नीतिगत विफलता पर पर्दा डालने में लगे हैं। लेकिन इतिहास सत्ता के अहंकार को कभी माफ नहीं करता।
1977 का जनादेश इस बात का प्रमाण है कि भारत का मतदाता भले ही कुछ समय के लिए खामोश रहे, लेकिन जब वह वोट की ताकत का इस्तेमाल करता है, तो बड़े से बड़े दंभ का सिंहासन ढह जाता है।
Pankaj Kumar Jat…✍️
G.F….
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