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सिकंदराबाद: : यहां स्थित राजबाला स्प्रिंग डेल अकादमी सिकंदराबाद में एक सप्ताह तक चला आर्य वीरांगना शिविर
संपन्न हो गया। इस अवसर पर विभिन्न विद्वानों और वक्ताओं ने महिला सशक्तिकरण पर अपने विचार रखे। शिविर के अंतिम दिन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे आर्य प्रतिनिधि उत्तर प्रदेश के यशस्वी प्रधान स्वामी स्वदेश जी महाराज ने कहा कि महिला सशक्तिकरण की बात समाज में रह रहकर उठती रही है। महिला सशक्तिकरण का अर्थ कुछ इस प्रकार लगाया जाता है कि जैसे महिलाओं को किसी वर्ग विशेष कर पुरूष वर्ग का सामना करने के लिए सुदृढ किया जा रहा है। जबकि हमको ध्यान रखना चाहिए कि भारतीय समाज में प्राचीनकाल से ही नारी को पुरूष के समान अधिकार प्रदान किये गये हैं। उसे अपने जीवन की गरिमा को सुरक्षित रखने और सम्मानित जीवन जीने का पूर्ण अधिकार प्रदान किया गया है। यहां तक कि शिक्षा और ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में भी महिलाओं को अपनी प्रतिभा को निखारने और मुखरित करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की गयी। महाभारत काल के पश्चात नारी की इस स्थिति में गिरावट आयी। उससे शिक्षा का मौलिक अधिकार छीन लिया गया। धीरे धीरे शूद्र गंवार, पशु और नारी को ताडऩे के समान स्तर पर रखने की स्थिति तक हम आ गये।जबकि शूद्र, गंवार पशु और नारी ये प्रताडऩा के नही अपितु ये तारन के अधिकारी है। इनका कल्याण होना चाहिए। जिसके लिए पुरूष समाज को विशेष रक्षोपाय करने चाहिए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे आर्य प्रतिनिधि सभा जनपद गौतम बुद्ध नगर के अध्यक्ष डॉ राकेश कुमार आर्य ने इस अवसर परकहा कि भारत की नारी सदा अपने पति में राम के दर्शन करती रही है। हमारे यह सांस्कृतिक मूल्य इस पतन की अवस्था में भी सुरक्षित रहे। मुस्लिम काल में हिंदू समाज के कई संप्रदायों ने महिलाओं को पर्दे में रखना आरंभ कर दिया। यह पर्दा प्रथा मुस्लिम समाज के आतंक से बचने के लिए जारी की गयी। जो आज तक कई स्थानों पर एक रूढि बनकर हिंदू समाज के गले की फांसी बनी हुई है।
अंग्रेजों के काल में भी यह परंपरा यथावत बनी रही, अन्यथा प्राचीन भारतीय समाज में पर्दा प्रथा नही थी। आज समय करवट ले रहा है। दमन, दलन और उत्पीडऩ से मुक्त होकर नारी बाहर आ रही है। यह प्रसन्नता की बात है, किंतु फिर भी कुछ प्रश्न खड़े हैं। नारी के सम्मान के, नारी की मर्यादा के, नारी की गरिमा के और नारी सुलभ कुछ गुणों को बचाये रखने को लेकर। नारी की पूजा से देवता प्रसन्न होते हैं हमारे यहां ऐसा माना जाता है। जहां नारी का सम्मान होता है वहां देवताओं का वास होता है। इसका अर्थ नारी की आरती उतारना नही है, अपितु इसका अर्थ है नारी सुलभ गुणों-यथा उसकी ममता, उसकी करूणा, उसकी दया, उसकी कोमलता का सम्मान करना। उसके इन गुणों को अपने जीवन में एक दैवीय देन के रूप में स्वीकार करना।
स्थानीय विधायक श्री लक्ष्मी राज ने अपने संबोधन में कहा कि जो लोग नारी को विषय भोग की वस्तु मानते हैं वो भूल जाते हैं कि नारी सबसे पहले मां है, यदि वह मां के रूप में हमें ना मिलती और हम पर अपने उपरोक्त गुणों की वर्षा ना करती तो क्या होता ? हम ना होते और ना ही यह संसार होता। तब केवल शून्य होता। उस शून्य को भरने के लिए ईश्वर ने नारी को हमारे लिये सर्वप्रथम मां बनाया। मां अर्थात समझो कि उसने अपने ही रूप में उसे हमारे लिये बनाया।
आर्य भाषा प्रचारिणी सभा जनपद गौतम बुद्ध नगर के अध्यक्ष ब्रह्मचारी आर्य सागर ने कहा कि मां को सर्वप्रथम पूजनीय देवी माना गया। मातृदेवो भव: का यही अर्थ है। आज नारी के इस सहज सुलभ गुण का सम्मान नही हो रहा है। नारी मां के रूप में उत्पीडि़त है। यदि थोड़ा सूक्ष्मता से देखा जाए तो आज वह मां बनना भी नही चाह रही है। पुरूष के लिए यह भोग्या बनकर रहना चाह रही है।इसीलिए परिवार जैसी पवित्र संस्था का आज पतन हो रहा है। उसे अपना यौवन, अपनी सुंदरता और अपनी विलासिता के लिए अपने मातृत्व से ऊपर नजर आ रही है। पुरूष के लिए वह भोग्या बनकर रहना चाहती है। खाओ, पिओ एवं मौज उड़ाओ की जिंदगी में मातृत्व को समाप्त कर वह अपने आदर्शों से खेल रही है।
विद्यालय की प्राचार्या श्रीमती सुनीता नागर ने कहा कि आज महिला पुरूष के झगड़े अप्रत्याशित रूप से बढ़ रहे हैं। पुरूष ही नारी की हत्या नही कर रहा है अपितु नारी भी पति की हत्या या तो कर रही है या करवा रही है। निरे भौतिकवादी दृष्टिकोण का परिणाम है यह अवस्था।
मां नारी के रूप में जब मां बनती है तो वह हमारे जीवन का आध्यात्मिक पक्ष बन जाती है जबकि पिता भौतिक पक्ष बनता है। जीवन इन दोनों से ही चलता है। हमारे शरीर में आत्मा मां का आध्यात्मिक स्वरूप है और यह शरीर पिता का साक्षात भौतिक स्वरूप।
कार्यक्रम के आयोजक संयोजक रहे स्वामी प्राण देव जी महाराज ने कहा कि अध्यात्म से शून्य भौतिकवाद विनाश का कारण होता है और भौतिकवाद से शून्य अध्यात्म भी नीरसता को जन्म देता है। नारी को चाहिए कि वह समानता का स्तर पाने के लिए संघर्ष अवश्य करें , किंतु अपनी स्वाभाविक लज्जा का ध्यान रखते हुए। निर्लज्ज और निर्वस्त्र होकर वह धन कमा सकती है किंतु सम्मान को प्राप्त नही कर सकती है। भौतिकवादी चकाचौंध में निर्वस्त्र घूमती नारी, अंग प्रदर्शन कर अपने लिए तालियां बटोरने वाली नारी को यह भ्रांति हो सकती है कि उसे सम्मान मिल रहा है,किन्तु स्मरण रहे कि यह तालियां बजना, उसका सम्मान नही अपितु अपमान है क्योंकि जब पुरूष समाज उसके लिए तालियां बजाता है तब वह उसे अपनी भोग्या और मनोरंजन का साधन समझकर ही ऐसा करता है। जिसे सम्मान कहना स्वयं सम्मान का भी अपमान करना है।
सभी विद्वानों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि हमें दूरस्थ गांवों में रहने वाली महिलाओं के जीवन स्तर पर भी ध्यान देना होगा। महिला आयोग देश में सक्रिय है। किंतु यह आयोग कुछ शहरी महिलाओं के लिए है। यह आयोग तब तक निरर्थक है जब तक यह स्वयं ग्रामीण महिलाओं के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए ग्रामीण आंचल में जाकर कार्य करने में अक्षम है। नारी सशक्तिकरण का अर्थ है नारी का शिक्षाकरण। शिक्षा से आज भी ग्रामीण अंचल में नारी 90 प्रतिशत तक अछूती है। उसे शिक्षित करना देश को विकास के रास्ते पर डालना है। इससे नारी वर्तमान के साथ जुड़ेगी। नारी सशक्तिकरण का यही अंतिम ध्येय है।
इस अवसर पर आचार्या संतोष, शैलेश कुमार, महाशय रंगीलाल आर्य, गाजियाबाद आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रतिनिधि ओमेंद्र आर्य , एडवोकेट ओमवीर भाटी ने भी अपने विचार व्यक्त किये। 7 दिन तक चले इस शिविर में आचार्य दशरथ कुमार आर्य प्रचारिणी सभा गौतम बुद्ध नगर के अध्यक्ष प्रधान विजेंद्र सिंह आर्य, गजराज सिंह आर्य, हेम सिंह आर्य ,रामप्रसाद आर्य, बलबीर सिंह आर्य, जिला उपाध्यक्ष महावीर सिंह आर्य , सचिव महेंद्र सिंह आर्य, जिला मंत्री पंडित धर्मवीर आर्य, जिला कोषाध्यक्ष दिवाकर आर्य, आर्य जगत के मूर्धन्य विद्वान आचार्य दिवाकर, सुभाष आर्य, रविंद्र आर्य , महाशय किशन लाल आर्य, किसान सभा के प्रतिनिधि मानवेंद्र भाटी, पवन आर्य सहित बड़ी संख्या में आर्यजन उपस्थित रहे। शिविर के अंतिम दिन अपनी विशिष्ट प्रतिभा का प्रदर्शन करने वाली आर्य वीरांगनाओं को विशेष पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। इस शिविर में सैकड़ो की संख्या में आर्य वीरांगनाओं ने भाग लिया । अंतिम दिन उनके अभिभावकों सहित बड़ी संख्या में लोगों उपस्थित रहे।
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