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दोष और दुष्टता मनुष्य जीवन को विकृत करने के लिए मुंह बाए खड़े होते हैं। इसीलिए मनुष्य को नैतिक शिक्षा देकर उसे मानवीय बनाने का प्रयास शिक्षा के माध्यम से किया जाता है। जब शिक्षा संस्कार आधारित होती है तो दोष और दुष्टता की दानवीय प्रवृत्ति से मनुष्य दूर रहने में सफल हो जाता है। परन्तु जब शिक्षा का व्यापारीकरण किया जाता है तो ये दोनों दानवीय प्रवृत्तियां स्वाभाविक रूप से मनुष्य के भीतर प्रवेश कर जाती हैं । इसका कारण केवल एक है कि उसे सही समय पर यह नहीं बताया गया कि उसे दानव बनना है या मानव बनना है ? इस प्रकार आज का मानव यदि नीट पेपर लीक कर रहा है,बेईमानी कर रहा है, एक दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण कर रहा है तो इसके लिए मानव दोषी नहीं है बल्कि मानव निर्मित वह व्यवस्था दोषी है जो उसे मानव बनने की शिक्षा ही नहीं दे रही, उसे वह व्यापारी बना रही है- यानी हृदयशून्य,भावशून्य और संवेदनाशून्य एक मशीन। 21वीं सदी की यह मानव निर्मित व्यवस्था बड़ी अनोखी है, गलती स्वयं करती है और दंड व्यक्ति को देती है।
अभी नीट पेपर लीक मामले को लेकर यदि शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र लिया गया तो यह किसी सीमा तक ठीक था, परंतु क्या ऊपरी लेबल बदल जाने से भीतर की शराब के स्थान पर अमृत आ गया ?
यदि नहीं तो इस त्यागपत्र का लाभ क्या हुआ ? केंद्र सरकार ने कानून बना दिया, क्या इसको पर्याप्त मान लिया जाए ? विशेष रूप से तब जबकि स्वाधीनता के पश्चात हमारे देश का यह इतिहास रहा है कि इस कालखंड में जितने भी कठोर कानून बने उनकी आड़ में उतना ही अधिक भ्रष्टाचार पनपा क्योंकि कठोर कानून के बाद चोरी की कीमत और भी अधिक बढ़ जाती है। यह स्थिति भी हमें बताती है कि मनुष्य को चोरी से कानून नहीं रोकेगा। उसे चोरी से रोकना है तो उसकी शिक्षा को संस्कार आधारित बनाओ, उसे धार्मिक ( मजहबी या कम्युनल नहीं ) बनाओ। यदि शिक्षा संस्कार आधारित होती तो वह बताती कि लज्जा नारी का आभूषण है। जिसे वह सरेआम ‘ माय बॉडी माय चॉइस ‘ कहकर अपने आप नीलामी पर नहीं चढ़ाती और न ही अपने शील को भंग कराने के लिए पुरुष समाज को आमंत्रित करती। तब जंतर मंतर पर जिस प्रकार का नंगा नाच हुआ है वह कदापि नहीं होता। समाज के जागरूक लोगों को इस बात के प्रति सजग और सावधान होकर चिंतन करना चाहिए कि यदि आज की पीढ़ी संस्कारहीन होकर माय बॉडी माय चॉइस की स्थिति तक पहुंच गई है तो फिर इस समाज को पाशविक बनाने से कोई नहीं रोक पाएगा। वर्तमान समय की था बहुत बड़ी समस्या है। इसके बारे में अभी हाल ही में जन्तर मंतर पर हुए छात्र-छात्राओं के प्रदर्शन ने बहुत कुछ स्पष्ट कर दिया है।
केंद्र सरकार को चाहिए कि वह शिक्षा व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन करे। शिक्षा को संस्कार आधारित बनाए। अब समय आ गया है जब हमें देश के नागरिकों को यह बताना पड़ेगा कि किसी की भी ‘ माय बॉडी माय चॉइस ‘ की सोच समाज के लिए उपयोगी नहीं हो सकती। बहुत जतन से हमारे पूर्वजों ने मानवीय संस्कृति को विकसित कर समाज की व्यवस्था को मर्यादित कर उसे सुव्यवस्थित किया है। अब इसे भंग नहीं किया जा सकता। सोचना पड़ेगा कि देश किधर जा रहा है और यदि वह दिशा गलत सिद्ध हो चुकी है तो उस ओर बढ़ने से रुकना पड़ेगा। “जैन – जी ” को बेलगाम छोड़कर उसे स्वच्छंदी और उच्छृंखल नहीं बनाया जा सकता। वास्तव में यह जैन जी जैसे शब्द वामपंथियों की खोज हैं । युवा पीढ़ी केवल युवा पीढ़ी होती है। जिसे पिछली पीढ़ी से जुड़कर चलना पड़ता है और पिछली पीढ़ी के संस्कारों को लेना पड़ता है। यह कह देने से काम नहीं चलेगा कि युवा पीढ़ी नए दौर में नई सोच के साथ आगे बढ़ेगी। नई सोच कितनी नैतिक हो सकती है या कितनी घातक हो सकती है ?- इस पर पिछली पीढ़ी को सोचने विचारने और निर्देश देने का पूरा अधिकार होता है। अब वामपंथियों के द्वारा देश की युवा पीढ़ी को बिगाड़ने की चलाई जा रही षड्यंत्र पूर्ण योजना का पर्दाफाश करने का समय आ गया है। इनकी सोच के कारण ही आज सनातनी समाज में बड़े बुजुर्गों की उपेक्षा हो रही है। नई पीढ़ी उनके निर्देश के अनुसार चलने में अपना अपमान समझा रही है । अब इस सोच ने देश को जंतर मंतर पर जो कुछ करके दिखाया है ,उससे हर संवेदनशील व्यक्ति स्तब्ध है। दुर्भाग्य से देश के युवा ने पिछली पीढ़ी के सोचने विचारने और निर्देश देने के अधिकार को छीन लिया है । उसी से यह समस्या खड़ी हुई है। सरकार को इस ओर ध्यान देना होगा । उसे इस बात में संकोच नहीं करना चाहिए कि वह वैदिक शिक्षा लाकर संस्कार आधारित समाज के निर्माण के लिए कृत संकल्प है। काम करना है तो पीछे हाथ बांधकर खड़े होने से काम नहीं चलेगा। हाथ खोलकर काम करना होगा। हमारे ऐसा कहने का अभिप्राय यह भी नहीं है कि सरकार उग्रवादी होकर अथवा अंधी होकर अपनी मान्यताओं को युवा वर्ग पर थोपने का काम करना आरंभ कर दे। सुरक्षित परिवेश बनाना भी उसकी जिम्मेदारी है। इसके लिए यह भी आवश्यक है कि अपनी सोच को स्थापित करने के लिए और युवाओं के भविष्य के निर्माण के लिए वह उन सभी लोकतांत्रिक साधनों का उपयोग कर सकती है जिनके माध्यम से आज की युवा पीढ़ी को अपने नैतिक अतीत से जोड़ा जा सकता है।
सरकार को और साथ ही साथ समाज के जागरूक लोगों को सोचना चाहिए कि देश में नीट पेपर लीक नहीं हुआ है अपितु लोगों के दिमाग लीक हो चुके हैं । नीट पेपर लीक न हो इसके लिए प्रबंध करने की आवश्यकता नहीं है, लोगों के दिमाग लीक न हों, प्रबंध इसके लिए करने की आवश्यकता है। निशाना वहां साधा जा रहा है जहां साधने से कुछ भी नहीं होने वाला और जहां निशाना साधना चाहिए उधर से हम फिर मुंह मोड़ रहे हैं। देश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि देश का विपक्ष स्वयं दिग्भ्रमित है । उसने नीट पेपर लीक मामले को तूल केवल इसलिए दिया है कि वह सरकार की उन संभावित आशंकाओं को लेकर आशंकित है जिसके कारण देश की सरकार ‘शिक्षा का भगवाकरण ‘ करना चाहती है। उसे नहीं पता कि शिक्षा का कथित भगवाकरण ही शिक्षा का संस्कारीकरण है। वेद और वैदिक शिक्षा के माध्यम से ही मनुष्य को मनुष्य बनाया जा सकता है तब वह सोचेगा कि नैतिकता क्या है और इसकी समाज के लिए क्या उपयोगिता है ?
(डॉ राकेश कुमार आर्य )
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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