मैं स्वागत के लिए आतुर हूं …

कविता –

मैं स्वागत के लिए आतुर हो….!

मैं स्वागत के लिए आतुर हो,
तुम्हारे लिए स्वागत द्वार बना रहा हूं मन में,
सोतों को, झरनों को, लबालब ताल-तलैया
सपनों में अविरल बहता पानी, दिल को मैं,
ऊपर ही ऊपर बहला रहा हूं।।

काली घटा, पानी भरें बादलों से लबालब हैं,
सोतें हुए सपनों में इन्हें देख हर्षा रहा हूं मैं,
हृदय के खोल दिए द्वार बरखा का आचमन
कर लूं, बरखा का साक्षात्कार करने के लिए,
हिरणों के छोनों जैसे कुलांचे भरने जा रहा।।

आओ, बादल धीरे से आ जाना तुम्हारे लिए,
आंखों में भी नमी आ गई हैं बहने को तैयार हैं,
देर ना लगाना वरना तटबंध इसके भी छोटे हैं,
हम लगाते टेर, तुम हमको ना तरसाना, बादल
जल्दी आना, कहीं ओर छुप नहीं जाना।।

मैं बांवरा जग सूना, बस बांट जोहते आस लगाए,
बैठे हैं, घन घटनाओं, गर्जाओं, बरस भी जाओ।।

मदन वर्मा “माणिक”
‌ ‌ इंदौर, मध्यप्रदेश
दिनांक 06/06/26

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