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हमारे समाज में जितनी भर भी कुरीतियां हैं या जितना भी रूढ़िवाद फैला हुआ है, उस सबके पीछे वैदिक ऋषियों की कोई बहुत ही शुद्ध ,सात्विक वैज्ञानिक परंपरा छिपी होती है। हमें यह मानना चाहिए कि जिस समय उस परंपरा का शुभारंभ हुआ उस समय वह बहुत पवित्र थी। कालांतर में उसमें रूढ़िवादिता की जंग लगी और वह अनेक प्रकार के दोषों से ग्रस्त होकर समाज के लिए बोझ बन गई। इनमें से एक दहेज का दानव भी है। अपने मूल यौगिक स्वरूप में दहेज कोई बीमारी नहीं है, कोई समस्या नहीं है, कोई रूढ़ि नहीं है। यह बहुत ही आदर्श परंपरा है। जब भी कोई बेटी अपनी ससुराल के लिए पिता के घर से विदा होती थी तो पिता उसे स्वेच्छा से कुछ दान देता था। पुत्री के लिए किया जाने वाला यह दान समाज की मान्य परंपरा में बहुत ही सम्मान रखना था। इसे बहुत ही सम्मान के भाव से लोग देखते थे। बेटी पिता के घर से विदा हो और उसे नए घर में प्रवेश करने पर किसी भी प्रकार की कोई प्रारंभिक असुविधा या समस्या न आए, इसके लिए पिता उसे स्वेच्छा से वस्त्र, आभूषण और जीवनोपयोगी कुछ आवश्यक वस्तुएं दान करता था। इसी को स्त्रीधन के रूप में मान्यता दी गई थी। संस्कृत साहित्य में इसे ‘यौतुक’ या ‘ देय ‘ के नाम से भी जाना गया है। ‘यौतुक’ या ‘ देय ‘ अपनी मूल परंपरा में तनिक भी गलत नहीं है। यह समाज की एक आदर्श परंपरा है । पिता अपनी पुत्री को कितना दहेज देगा ? इसमें इसकी भी कोई निश्चित सीमा नहीं है। जिसकी जैसी अपनी आर्थिक स्थिति हो और विवाह के समय जैसी परिस्थिति हो, उसके अनुरूप दहेज देकर वह बेटी को विदा कर सकता है। समाज उसे इसी रूप में स्वीकार करेगा और उसका धन्यवाद ज्ञापित कर पुत्री को विवाह करने के पश्चात ले जाएगा।
भारत की यह आदर्श परंपरा अरब में जाकर ‘ जहेज ‘ कहलाई। देय + यज्ञ= देयज्ञ शब्द बिगड़कर सामने आया इसी को अरब में ‘ जहेज ‘ कहा गया। मौलिक शब्द की विकृति आज हमारे सामने मौलिक पवित्र परंपरा की विकृति के रूप में दहेज बनकर सामने खड़ी है। जब शब्द ही विकृत हो गया तो शब्द की मौलिक भावना का विकृत हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है। विदेशों के उच्छिष्टभोजी भारतीय लेखक शब्द की गरिमा, उसकी मौलिक चेतना अर्थात उसके यौगिक स्वरूप से न जुड़कर उसका मूल विदेश में खोजते हैं और भारत की ज्ञान परंपरा को जानबूझकर अनदेखा कर उस शब्द को और उसकी परंपरा को हम पर बाहरी दृष्टिकोण से थोपने का अनुचित प्रयास करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि हम अपनी मौलिक चेतना और ज्ञान परंपरा से टूट जाते हैं।
प्राचीन भारतीय वैदिक संस्कृति में दहेज को ‘स्त्रीधन’ के रूप में मान्यता दी गई थी। उन दिनों दहेज किसी भी प्रकार के आर्थिक संकट के समय दुल्हन की आर्थिक सुरक्षा के लिए उसके माता-पिता और सगे-सम्बन्धियों द्वारा प्रेमपूर्वक दिया जाता था।
आज विवाह समारोहों पर जिस प्रकार की फिजूलखर्ची की जा रही है और दहेज का दानव जिस प्रकार हमारी ललनाओं को डंस रहा है, उसे देखकर आत्मा काँप उठती है । लगता नहीं कि हम अपनी प्राचीन आदर्श वैदिक प्रणाली को पुनर्जीवित कर पाएंगे ? इसके लिए दोषी हमारा सारा हिंदू समाज है। जिसने पश्चिम की शिक्षा प्रणाली को अपनाकर वैदिक शिक्षा प्रणाली को जीवन से निकाल दिया है। जिन छात्र-छात्राओं का निर्माण हो रहा है वही आज जंतर मंतर पर अश्लील नाच कर रही हैं । यहां पर कोई राजनीतिक चर्चा नहीं हो रही है, जिससे यह माना जाए कि हमारा संकेत किसी सरकार के विरोध में उतर आए छात्र-छात्राओं की ओर है। हमारा संकेत केवल यह है कि जो कुछ भी हुआ है वह हमारे वैदिक संस्कारों और मूल्यों के विपरीत हुआ है और यह पश्चिमी शिक्षा प्रणाली का परिणाम है। ऐसे बच्चों से आप आदर्श वैदिक शिक्षा प्रणाली अपनाने और वेदों की आदर्श व्यवस्था को जीवन में उतारने के बारे में सोच भी नहीं सकते।
इस पीढ़ी को दृष्टिगत रखते हुए यदि विवाह के संदर्भ में ही सोचा जाए तो इनके दृष्टिकोण और भारत की वैदिक शिक्षा प्रणाली के दृष्टिकोण में जमीन आसमान का अंतर है। यह पीढ़ी विवाह पूर्व ब्रह्मचर्य से परिचित नहीं है। इसके बाद विवाह की उपयोगिता क्या है? और विवाह के बाद किस प्रकार अपने जीवनसाथी के प्रति ईमानदार रहकर उसे निभाने का संकल्प लिया जाता है ? इसे यह पीढ़ी नहीं जानती।
ऋषि दयानन्द ने विवाह का उल्लेख कर आश्वलायन गृह्यसूत्र के आधार पर लिखा है कि ” विवाह उसको कहते हैं कि जो पूर्ण ब्रह्मचर्यव्रत द्वारा विद्याबल को प्राप्त तथा सब प्रकार से शुभ गुण-कर्म-स्वभावों में तुल्य, परस्पर प्रीतियुक्त होके सन्तानोत्पत्ति और अपने-अपने वर्णाश्रम के अनुकूल उत्तम कर्म करने के लिए स्त्री और पुरुष का सम्बन्ध होता है।”
आज की पीढ़ी इस आदर्श वैदिक व्यवस्था से कितनी दूर निकल गई है ? – महर्षि दयानंद जी के उपरोक्त शब्दों को पढ़कर यह स्वत: स्पष्ट हो जाएगा।
समाज के संस्कारहीन लोग ही बेटियों को जला रहे हैं , संस्कारहीन लोग ही समाज में संस्कारहीन युवाओं का निर्माण कर रहे हैं। दहेज में दबाव बनाकर न जाने क्या मांग लिया जाए ? – इन लोगों की संस्कारहीनता के दृष्टिगत इस संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
आज आवश्यकता भारत के प्राचीन वैदिक संस्कारों के साथ समन्वय स्थापित करने की है। इन बातों पर विचार करने की आवश्यकता है कि हम विवाह के समय कैसे मर्यादित, संतुलित , आचरणशील लोगों को वरयात्री अर्थात बाराती के रूप में चुनें ? वहां पर किस प्रकार का हमारा परिधान हो ? बाजे की आवश्यकता है तो वह एक ही पर्याप्त है। डीजे की थाप पर अश्लील संगीत को प्रस्तुत करना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। एक भी डीजे विवाह में नहीं होना चाहिए। समाज के सभी लोगों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि हम विवाह समारोह में सात्विक परिवेश बनाकर अच्छी चर्चा करने के लिए उपस्थित होते हैं । कुछ ऐसे लोग वहां हमको मिलते हैं जो बहुत दिन पश्चात मिल रहे होते हैं। उनके साथ कुछ आत्मीय बातें करनी आवश्यक होती हैं । उनके लिए भी शांति का वातावरण आवश्यक है। वहां पर धार्मिक विद्वानों को बुलाकर उनके माध्यम से भी विवाह के महत्व पर प्रकाश डलवाना चाहिए या फिर वहां पर ऐसी वीडियो आदि चल रही हों जिनमें विवाह के महत्व, उसकी गरिमा और उसकी उपयोगिता जैसे प्रासंगिक विषयों पर चर्चा चल रही हो। ऐसा सुमधुर संगीत वहां पर गूंजना चाहिए जो वर वधू को प्रेरणा देने वाला हो। भड़काऊ और अश्लील गाने वहां पर होने ही नहीं चाहिए। ऐसे शांतिपूर्ण सात्विक परिवेश में लगता है कि हम कहीं ऐसे स्थान पर पहुंच गए हैं जहां दिव्यात्माओं का समागम हो रहा हो। इसी को सुरलोक कहते हैं। सुरलोक की यात्रा सभी को प्रिय होती है। वास्तव में यह हमारी आत्मा की इच्छा होती है। विवाह स्थलों को हम सुरलोक बना सकते हैं। बस थोड़ी सी समझ दिखाने की आवश्यकता है। आज विवाह से गंभीर प्रवृत्ति के बाराती इसलिए गायब हो रहे हैं कि उन्हें सर्वत्र असुरता ही दिखाई देती है। कहीं शराब चल रही होती है, कहीं तामसिक वृत्ति का भोजन, शराब आदि चल रहे होते हैं , कहीं अश्लीलता प्रकट करने वाला संगीत चल रहा होता है, कहीं अश्लील नृत्य हो रहा होता है, कहीं अश्लील मजाक हो रहे होते हैं- इन सब से लगता नहीं कि हम एक बहुत जिम्मेदारी भरे माहौल में उपस्थित हुए हैं और यहां कुछ ऐसा होने जा रहा है जो दो दिव्य आत्माओं का मिलान कराने वाला है ? तामसिक और राजसिक परिवेश में हम सात्विकता का आनन्द ढूंढते हैं। जिनका मिलना वहां सर्वथा असंभव होता है । यही कारण है कि विवाह जैसी पवित्र संस्था की पवित्रता आज भंग हो चुकी है। बेटी के विवाह में हम महंगे महंगे गिफ्ट लेते हैं। कन्यादान के नाम पर लोगों से वसूली करते हैं। इसी प्रकार बेटे के विवाह में आशीर्वाद समारोह के समय भी गिफ्ट ली जाती है । वास्तव में यह गिफ्ट नहीं है, यह आर्थिक सहयोग है- जिसे दूसरे नाम से वरपक्ष प्राप्त करता है। इस प्रकार की बातों को देखकर पता चलता है कि केवल दहेज ही हमारे लिए अभिशाप नहीं है,महंगे गिफ्ट और वहां का भोजन तथा तामसिक परिवेश भी हमारे लिए मौत का कारण बन रहा है। भोजन के नाम पर हम वहां पर कौन सा जहर खा रहे हैं या लोगों को खिला रहे हैं ? शायद हमको स्वयं को भी इसका पता नहीं है।
इसके लिए हम सभी दोषी हैं। जिस समय हमारे घर में बेटी जवान हो रही होती है, तब हम दहेज के विरोधी बन जाते हैं, और जब बेटा जवान हो रहा होता है तो दहेज के समर्थक बन जाते हैं। यह दोहरे मानदंड समाज के लिए घातक होते हैं। समाज में ऐसे अनेक लोग रहे हैं जिन्होंने बेटी के विवाह के समय पर तो दहेज विरोधी आंदोलन चलाया, पर जब बेटे का विवाह आया तो दहेज विरोधी आंदोलन के ही विरोधी हो गए। तब दहेज या तो सीधे-सीधे ले लिया या फिर चुपचाप चोर दरवाजे से प्राप्त कर लिया। ऐसे लोगों का भांडा जब समाज में फूटता है तो वह लोगों के लिए घृणा के पात्र बन जाते हैं । इसका समाज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। ऐसे लोगों के कारण दहेज विरोधी आंदोलन सफल नहीं हो पाया।
अच्छी बात यह होगी कि जब किसी परिवार में किसी लड़के या लड़की का विवाह आए तो दोनों पक्ष वैचारिक धरातल पर समान होने चाहिए। उनके वैचारिक बौद्धिक धरातल समान हों। समानता के स्तर पर दोनों बैठकर आवश्यक वार्तालाप करें और फिजूलखर्जी और फिजूल के दिखावे से बचने के प्रत्येक बिंदु पर चर्चा करें । कहां से कितनी फिजूलखर्ची को रोका जा सकता है ? किस प्रकार विवाह को गरिमापूर्ण, शांतिपूर्वक वैदिक विधि विधान से संपन्न कराया जा सकता है ?- किस प्रकार विवाह की गंभीरता, गरिमा, उपयोगिता आदि को दोनों बच्चों को अर्थात लड़का और लड़की को बताया और समझाया जा सकता है ? किस प्रकार विवाह की पूर्ण विधि को समझाकर दो दिव्यात्माओं को उनके पवित्र मिलन के शुभ अवसर पर आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है ? – इस पर चर्चा करें और चर्चा में निकले हुए निष्कर्ष के आधार पर सारे कार्यों को संपन्न कर लें। बारातियों में गंभीर लोगों का उपस्थित रहना बहुत आवश्यक है। ऐसे गंभीर लोग सात्विक परिधान में हों, जिससे सात्विकता का परिवेश निर्मित हो। उनकी प्रत्येक बात में गंभीरता दिखाई देनी चाहिए। फिजूल जुबानखर्ची से भी बचना चाहिए।
भोजन की व्यवस्था में भी सात्विकता होनी चाहिए। तामसिक और विपरीत प्रकृति के भोजन सर्वथा निषिद्ध किए जाने चाहिए । इसी प्रकार के भोजन को खाकर लोगों को कई प्रकार की बीमारियां लग रही हैं । फूड प्वाइजनिंग जैसी समस्या से लोगों को दो-चार होना पड़ रहा है। यह नहीं मानना चाहिए कि सभी लोग अपनी-अपनी रुचि का भोजन लेकर चले जाएंगे , इसलिए जितने चाहें उतने आइटम बनाकर मेज पर रख देने चाहिए। बहुत लोगों से यह गलती होती है कि वह स्वाद के चक्कर में विपरीत प्रकृति का भोजन अर्थात थोड़ी देर पहले दही लेना कुछ देर बाद जाकर के दूध ले लेने की गलती कर देते हैं, जिससे उनको बीमारी का सामना करना पड़ता है। इस पर भी समाज के चिंतनशील लोगों को विचार करना चाहिए।
आजकल हम लगन सगाई समारोह, फिर बारात और उसके बाद रिसेप्शन इन तीन स्थानों पर विवाह में विशेष खर्च कर रहे हैं। इसके बाद गुर्जर समाज में तो बूरा खाने के लिए भी लोग बड़ी संख्या में जाते हैं, इस प्रकार एक ही विवाह के लिए हम चार बार विशेष खर्च करते हैं। इन चारों स्थानों पर अधिक से अधिक दिखावा करना और अधिक से अधिक खर्च करना हमने अपने लिए स्टेटस सिंबल मान लिया है। यह स्टेटस सिंबल एक मनोरोग है, बीमारी है। जिससे हर व्यक्ति ग्रसित हो चुका है। हम यह नहीं सोचते कि इस स्टेटस सिंबल को सकारात्मक और सात्विक बनाने के लिए हम वैदिक शैक्षणिक संस्थानों में दान देकर या किसी हॉस्पिटल के निर्माण के लिए दान देकर या किसी गरीब की बेटी के विवाह के लिए दान देकर या किसी गरीब के बच्चे को पढ़ाने में दान देकर भी अभिव्यक्ति दे सकते हैं। हमारी प्रवृत्ति और हमारी मानसिकता संकुचित हो गई है। जबकि होना यह चाहिए था कि हम अपनी प्रवृत्ति और मानसिकता को मुखरित करते और उसे सर्व समाज के लिए उपयोगी बनाते।
इन सब बातों पर आज विचार करने की आवश्यकता है और यह समझने की आवश्यकता है कि हमारा समाज किधर जा रहा है ? माना जा सकता है कि हमारे समाज में बहुत सारी प्रतिभाएं हैं, बहुत सारे लोग भामाशाह की भूमिका में भी काम कर रहे हैं, बहुत सारे लोग समाज को नई दिशा देने का भी काम कर रहे हैं ,परंतु यथार्थ के धरातल पर उतरकर काम करने वाले लोग कितने हैं और यदि कुछ लोग कर रहे हैं तो उन्हें सहारा देने वाले लोग कितने हैं ? इस पर भी चर्चा करने और कार्य करने की आवश्यकता है।
(डॉ राकेश कुमार आर्य )
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
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