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. . . तो क्या भरत तिवारी का एनकाउंटर एक सरकारी हत्या है?….

जेडी न्यूज विजन…

(सुरेन्द्र कुमार वर्मा)

भरत तिवारी के इनकाउंटर पर ही प्रोटेस्ट क्यों कुछ लोग कहते है एनकाउंटर तो और भी बहुत से लोगों के हुए है। बात इतनी है की भरत तिवारी के बारे में थोड़ा जानिए तो शरीर का रोयां सिहर जाएगा। किसी फिल्म की कहानी सी लगती है।

एक गांव था जो गंगा के बाढ़ में समा गया। उस गांव के लोग दुबारा बसना शुरू हुए। अधिकतर आबादी पिछड़े और दलितों की थी। भरत तिवारी ने वहां लोगों के जरूरतों के लिए आवाज उठाना शुरू किया। नई बस्ती तक सड़क पहुंचाने से लेकर बिजली तक, चापाकल से लेकर राशन तक। लोग जहां बसे थे वो जगह बहुत नीचे था, पानी लग रहा था, भरत तिवारी अधिकारियों से लगातार कोशिश कर रहे थे की वहां कुछ मिट्टी भराया जाए ताकि लोगों को पानी लगने से बचाव हो। पिछले साल भर से भरत तिवारी स्थानीय प्रशासन और अधिकारियों से ज्ञापन, संवाद, दवाब, प्रोटेस्ट सब माध्यम से कोशिश कर रहे थे। धीरे धीरे प्रशासन ने उन्हें मानसिक रूप से परेशान करना शुरू किया, वो फ्रस्ट्रेट होने लगे व्यवस्था से, फिर उन्हें मानसिक विक्षिप्त बताया गया।

भरत तिवारी एक सच्चा हिन्दुस्तानी था, देशभक्त था, जनता के लिए काम करता था, उसे देश से प्रेम था। लेकिन जब वो व्यवस्था से हार गया, काले अंग्रेजों वाले सिस्टम ने उसे मजबूर कर दिया। फिर एक नौजवान को एक ही रास्ता दिखा की बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत है। उसने अपने गले का महावीरी बचके हथियार खरीदा और पुलिस वालों को मजबूर करने की कोशिश की। वो सिर्फ ये वादा चाहता था की आश्वासन दे की झूठा वादा नहीं करेंगे, लोगों का काम पूरा कर देंगे। पुलिस ने पहले आश्वासन दिया की हथियार डाल दो, वादा पूरा होगा। और जब भरत तिवारी ने हथियार डाल दिया तब उसे गोली मार दी गई।

भरत तिवारी क्रांतिकारी ही था, और कैसे होते हैं क्रांतिकारी ? आप उसके अंतिम यात्रा में जमा हुए लोगों के हुजूम का वीडियो देखिए। उन लोगों को सुनिए जिसके लिए वो काम करता था। लोग उसे उनके लिए भगवान बता रहे हैं। एनकाउंटर वैसे भी कानूनी रास्ता नहीं है। लेकिन उसमें भी बिना अपराधी बैकग्राउंड वाले एक समाजसेवी नौजवान जो व्यवस्था से फ्रस्ट्रेट होकर भटक गया और सरेंडर भी कर दिया, उसका एनकाउंटर एक सरकारी हत्या है।….

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