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डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी महर्षि दयानंद जी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा से गहराई से प्रभावित थे। उन पर महर्षि दयानंद जी के सत्यार्थ प्रकाश का भी गहरा प्रभाव था। 1944 में जब सिंध की सरकार ने सत्यार्थ प्रकाश के चौदहवें समुल्लास पर प्रतिबंध लगाने की बात उठाई और इस संबंध में नवंबर 1943 में जब मुस्लिम लीग ने दिल्ली में बाकायदा अपना अधिवेशन कर केंद्र सरकार से इस दिशा में यथाशीघ्र निर्णय लेने का प्रस्ताव पारित किया तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी और वीर सावरकर जी ने विशेष रुचि लेकर आर्य समाज के अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति प्रदान की। 20, 21, 22 फरवरी 1944 को आयोजित किए गए इस अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन के अध्यक्ष डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी बनाए गए। उस समय उन्होंने अपने भाषण में यह स्पष्ट कर दिया था कि यदि ब्रिटिश सरकार मुस्लिम लीग के दबाव में आकर महर्षि दयानंद जी के सत्यार्थ प्रकाश के साथ किसी भी प्रकार का अत्याचार करती है तो इसका भरपूर प्रतिरोध किया जाएगा। सावरकर जी ने भी उस समय ब्रिटिश सरकार और मुस्लिम लीग की कड़ी खिंचाई करते हुए अपने भाषण में उसे कड़ा संदेश देने का सराहनीय प्रयास किया था। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सत्यार्थ प्रकाश के साथ संभावित छेड़छाड़ को लोगों की भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जोड़ते हुए ऐसी किसी भी संभावित कार्यवाही को मनुष्य की भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करने का प्रयास बताया था। उन्होंने पहले हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में और बाद में भारतीय जनसंघ के नेता के रूप में आर्य समाज के हिंदू शुद्धि आंदोलन और घर वापसी के कार्यक्रमों में गहरी रुचि दिखाई थी और इन दोनों मुद्दों पर आर्य समाज के साथ मिलकर कार्य किया था। इस प्रकार उनका आर्य समाज की नीतियों और उसके सिद्धांतों में गहरा विश्वास था। यही कारण था कि जब उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की तो उसके कार्यक्रम के आयोजन के लिए दिल्ली के राघोमल आर्य कन्या विद्यालय को चुना। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में आर्यजन उपस्थित रहे थे।
भारतीय जन संघ के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे बलराज मधोक भी जम्मू में आर्य समाज की पृष्ठभूमि वाले आर्य खत्री परिवार से ही आते थे। उनकी शिक्षा दीक्षा भी दयानंद एंग्लो विद्यालय से ही हुई थी। उनके अतिरिक्त लाला हंसराज गुप्ता ( राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख नेता और दिल्ली के महापौर रहे ) पंडित मौली चंद्र शर्मा, पंडित प्रकाश वीर शास्त्री स्वामी रामेश्वरानंद जी महाराज के नाम भी उल्लेखनीय है जो कि आर्य समाजी होकर जनसंघ के लिए काम करते रहे थे। पंडित प्रकाश वीर शास्त्री जी 1974 में और स्वामी रामेश्वरानंद जी महाराज 1962 में करनाल से जनसंघ के टिकट से लोकसभा सदस्य के रूप में भी चुने गए थे। हरियाणा से ही आर्य समाज के नेता के रूप में श्री चंद गोयल जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे थे। जबकि जगदीश प्रसाद वैदिक जी जहां आर्य समाज के प्रचार प्रसार के लिए काम करते रहे , वहीं वे जनसंघ के लिए भी काम करते रहे थे।
आज कई आर्य समाजी ऐसे हैं जो आरएसएस,बीजेपी या विश्व हिंदू परिषद में जाकर उनकी विचारधारा में रंग जाते हैं। जबकि पुराने आर्य समाजी अपनी छाप छोड़ते थे और संगठन की नीतियों में क्रांतिकारी परिवर्तन कर उसे अपने अनुसार मोड़ने की क्षमता रखते थे। अध्ययन के प्रति रुचि कम होने का परिणाम यह है कि हम अनेक ऐसे आर्य नेताओं को बीजेपी ,आरएसएस, जनसंघ या किसी भी हिंदूवादी संगठन का नेता मानकर उसे पौराणिक मान लेते हैं जिन्होंने राष्ट्रवादी क्रांतिकारी आंदोलन को गति देने या कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण और छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी नीतियों का विरोध करने के लिए कभी इन संगठनों की या तो स्थापना में सहयोग दिया था या इन्हें नई दिशा और नई ऊंचाई देने का महत्वपूर्ण कार्य किया था । उन्हीं में से एक श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी हैं। तनिक कल्पना कीजिए जब जनसंघ के इस महान क्रांतिकारी और बलिदानी नेता पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ प्रकाशवीर शास्त्री जी और स्वामी रामेश्वरानंद जी जैसे लोग बैठकर मंत्रणा किया करते होंगे तो क्या वहां पर मंत्रणा का स्तर पौराणिक दृष्टिकोण का रहता होगा या स्वामी दयानंद जी महाराज के सत्यार्थ प्रकाश में वर्णित महर्षि मनु प्रतिपादित राजधर्म जैसा रहता होगा ?
(डॉ राकेश कुमार आर्य)
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