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मोह बहुत मोहीला
यह मोह बहुत ही मोहीला होता है,
लेकिन उतना ही दर्दीला होता है।
जब कभी किसी से मोह टूट जाता है,
तो पलकों से भी अधिक हृदय रोता है।
यह सही गलत दिल से निकाल देता है,
यह वो करवाता जो इसको भाता है।
यह नागफांस में कस लेता है जिसको,
तो गरुड़ देव भी छुड़ा न पाते उसको।
क्या पता कौन किस पर मोहित हो जाए,
फिर दुनिया चाहे उलट पलट हो जाए।
अतिमोह भी सदां दुख देता रहता है,
मीरा की तरह गरल पीना पड़ता है।
सीता ने मोह किया सोने के मृग से,
पति विरह में बहे अनगिन आंसू दृग से।
जब पुत्रमोह में नृप अंधा होता है,
तो मर्यादा का चीर हरण होता है।
यदि मोह करो तो कान्हा जैसा करना,
जग निर्मोही भी कहे प्यार से सुनाना।
गीतकार अनिल भारद्वाज एडवोकेट हाईकोर्ट ग्वालियर म प्र
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