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गीता में श्री कृष्ण जी कहते हैं कि :-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ 4.7॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ 4.8 ॥
गीता के इन श्लोक का अर्थ करते हुए हमें बताया गया कि
भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों को आश्वासन दिलाते हुए कहते हैं:-
” जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं प्रकट होता हूँ अवतरित होता हूँ |
साधुजनों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की स्थापना करने के लिए, मैं हर युग में प्रकट होता हूँ | ( श्रीमद्भगवद्गीता ४.७ & ४.८)
गीता के इस श्लोक के इस अर्थ ने समाज में निकम्मापन फैलाया। इस प्रकार का अर्थ करने से भारत की परंपरागत वीरता और शौर्य की परंपरा को घुन लगा। लोग इस प्रतीक्षा में बैठ गए कि जब पाप बढ़ जाएगा अथवा अधर्म खूब बढ़ जाएगा तब परमपिता परमेश्वर स्वयं श्री कृष्ण के रूप में अवतार लेंगे और सारे पापियों का नाश कर देंगे। जबकि भारत की परंपरा यह रही है कि क्षत्रिय वर्ग पापियों का विनाश करने के लिए सर्वदा उद्यत रहता आया है। उन्हें किसी मनुष्य के रूप में ईश्वर के अवतार लेने की प्रतीक्षा नहीं रही। वह स्वयं ही अपने धर्म का पालन करते रहे और सज्जन शक्ति के कल्याण के लिए दुष्टों का विनाश करते रहे।
यदि उपरोक्त श्लोक का ध्यानपूर्वक अवलोकन किया जाए तो पता चलता है कि श्री कृष्ण जी यहां अपने आप को ईश्वर का अवतार घोषित नहीं कर रहे। वह यह भी नहीं कह रहे हैं कि जब-जब पाप की वृद्धि होगी अथवा धर्म का आचरण बढ़ेगा तो मैं ईश्वर के अवतार के रूप में अवतरित होऊंगा।
गीता के श्लोक पर यदि गंभीरता से विचार किया जाए तो श्री कृष्ण जी अर्जुन से कह रहे हैं कि “हे भरत कुलोत्पन्न अर्जुन ! इस संसार में जब-जब धर्म की हानि होती है उसका ह्रास या पतन होता है और अधर्म के प्रति लोगों में रुचि बढती है-अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं (अधर्म के विनाश के लिए और धर्म की रक्षा के लिए) जन्म लेता हूँ, अपने आप को सृजता हूं।”
श्रीकृष्णजी ने यहाँ पुनः भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एक सनातन सत्य को प्रकट किया है। योगेश्वर कह रहे हैं कि अधर्म की वृद्धि और धर्म का नाश या पतन जीवनमुक्त आत्माओं के लिए व्याकुल करने वाला होता है। ऐसी जीवात्माएँ मोक्ष में रहकर भी इस बात के लिए तड़प उठती हैं कि अब हमें संसार में चलकर धर्म के हो रहे ह्रास को रोकने के लिए विशेष उद्यम करना चाहिए। यहाँ श्रीकृष्णजी यह संकेत भी कर रहे हैं कि संसार में रहने वाले हम सब लोगों को भी धर्म की हानि नहीं होने देनी चाहिए। यदि अधर्म की वृद्धि और धर्म का ह्रास हो गया तो संसार में सज्जन प्रकृति के लोगों का जीवन ही कठिन हो जाएगा। जबकि संसार में प्रकृति का यह नियम है कि वह सज्जनों का कल्याण चाहती है। सज्जन वही है जो प्रकृति के मित्र हैं, प्रकृति के नियमों में जिनकी आस्था है और जो अपने जीवन को ईश्वरीय व्यवस्था में रखकर जीने के अभ्यासी हो गये हैं, जो प्रकृति के जर्रे- जर्रे में ईश्वर का दर्शन करते हैं और हर प्राणी में उसी की ज्योति देखते हैं, जो अपने इसी दिव्य गुण के कारण दूसरे लोगों के अधिकारों का तनिक सा भी हनन करने में विश्वास नहीं रखते हैं, जिनके जीवन व्रत आत्मोद्धार और संसार के कल्याण के लिए धारे जाते हैं। ऐसे लोगों के बने रहने से ही संसार में धर्म की रक्षा हो पाना सम्भव है। यदि संसार से ऐसे लोग चले गये या संसार ऐसे लोगों से वंचित हो गया तो संसार का जीवनचक्र बाधित हो जाएगा।
श्री कृष्ण जी कह रहे हैं कि अर्जुन ! महात्मा जनों के लिए अनुकूल परिस्थिति बनाना और सज्जन प्रवृत्ति के लोगों के लिए जीवन के संघर्ष में आ गई राक्षसी प्रवृत्तियों का निवारण करना तेरे जैसे क्षत्रियों का कार्य है। यही तेरा धर्म है तू इसे निष्काम भाव से पूर्ण कर । जो तेरे सामने खड़े हैं इनको दृष्टा भाव से देख। जब दृष्टा भाव से देखने लगेगा और इनमें राग और द्वेष नहीं पालेगा तो तू निष्काम भाव से कर्म करने वाला योगी हो जाएगा। फिर तुझ पर कोई पाप नहीं लगेगा। जैसे आंख किसी को देखती है, यदि देखने में उसे अच्छा लगा तो उसको राग पैदा हो जाएगा और यदि बुरा लगा है तो द्वेष पैदा हो जाएगा। जब आंख केवल देखने का काम करेगी और रागद्वेष में नहीं फंसेगी तब वह निष्काम कर्म योग के पथ पर चल रही होगी। तब वह स्वधर्म में स्थित हो जाती है। इसलिए तुझे भी स्वधर्म अर्थात निष्काम कर्म में स्थिर हो जाना चाहिए। यहां आए हुए सभी योद्धाओं को बिना राग द्वेष के देख और यह समझ कि जब यह सारे इस कुरुक्षेत्र की सीमा के भीतर आ गए हैं अर्थात धर्म क्षेत्र के रणांगण में प्रवेश कर गए हैं तो इनके बारे में यह मान ले कि ये यहां स्वाभाविक रूप से मरने के लिए ही आए हैं।
अगले ही श्लोक में श्रीकृष्णजी अपनी बात को और भी अधिक स्पष्ट करते हैं-
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।।
अर्थात् ‘ हे पार्थ ! साधुओं की रक्षा के लिए, आत्मरत योगियों के कल्याण के लिए संसार के भले के कार्यों में लगे लोगों के कल्याण के लिए, धार्मिक कार्यों से संसार का उपकार करने वाले सज्जनों की रक्षा के लिए व दुष्टों को समाप्त करने के लिए अर्थात् उनके विनाश के लिए और धर्म की संस्थापना के लिए मैं युग-युग में जन्म लेता हूँ।
कहने का अभिप्राय है कि श्रीकृष्णजी अनन्त काल के लिए मोक्ष में भी पड़े रहना पसन्द नहीं करते, यदि संसार में अधर्म फैल रहा है तो वे मोक्षानन्द को भी छोड़कर संसार में आना पसन्द करेंगे। अतः श्रीकृष्णजी को संसार में धर्मानुकूल व्यवस्था हर स्थिति में चाहिए। इसके लिए उन्हें यदि मोक्षानन्द भी छोड़ना पड़े तो वह छोड़ देंगे। व्यक्ति की महानता का यही पैमाना है कि वह संसार के कल्याण के लिए निजी स्वार्थ को सदा तिलांजलि दे दे।
कृष्ण जी जो कुछ कह रहे हैं वह लोकभाषा है। मोक्ष आनंद छूटेगा या नहीं छूटेगा, यह एक अलग बात है। परंतु वह धर्म के प्रति इतने निष्ठावान हैं कि उसकी स्थापना को हर स्थिति में स्थापित रखना चाहते हैं। वे मनुष्य को उसका स्वधर्म बताना चाहते हैं और उसे निष्काम कर्मयोगी बना देना चाहते हैं । जब संसार के लोग इस प्रकार निष्काम कर्म योग में ढल जाते हैं तो संसार स्वर्ग बन जाता है। जिससे उन लोगों का भी कल्याण हो जाता है जो वेद आदि शास्त्रों को पढ़ तो नहीं पाए परंतु धार्मिक अवश्य हैं । आज ऐसे लोगों को लोग एससी/ एसटी पता नहीं क्या-क्या कहकर उपेक्षित करते हैं। मध्यकाल में भारत के लोगों ने भी इन लोगों का तिरस्कार और बहिष्कार किया। यदि श्री कृष्ण जी के अनुकूल सारा सामाजिक और राष्ट्रीय परिवेश कर्म योग से पूरित होता तो ऐसा कभी नहीं होता । श्री कृष्ण जी की योजना थी कि कोई भी व्यक्ति सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय पाने से वंचित नहीं रहना चाहिए। यह तभी संभव है जब प्रत्येक व्यक्ति निष्काम कर्म योग की विधि को अपना लेगा अर्थात श्री कृष्ण जी का कानून = विधि सर्व कल्याण के लिए है । किसी को जेल में डालने के लिए नहीं।
योगेश्वर श्रीकृष्णजी अर्जुन को कह रहे हैं कि तू भी किसी ऊहापोह में मत पड़, जब मैं मोक्षानन्द को भी त्यागने के लिए उद्यत हूँ और हर स्थिति में संसार में धर्म की संस्थापना करना मेरा लक्ष्य है तो तुझे भी धर्म की संस्थापना को ही अपना जीवनव्रत मानकर उसकी रक्षा के लिए हथियार उठा लेने चाहिए। यदि तू इसमें प्रमाद करेगा तो समझ लेना कि तू भी ऐसा करके संसार में अधर्म की वृद्धि के लिए ही कार्य कर रहा होगा, जो कि तेरे जैसे धर्म योद्धाओं के लिए शोभायमान नहीं होगा।
श्री कृष्ण जी अर्जुन को यह याद दिलाना चाहते हैं कि दुर्योधन ने अपना क्षत्रिय धर्म अर्थात स्वधर्म त्याग कर भरे दरबार में पर नारी को अपनी जंघा पर बैठाने की बात कह कर धर्म का अपमान किया है । अर्जुन ! यदि राजदरबारों में धर्म का इस प्रकार अपमान होगा तो आम आदमी का हाल क्या हो जाएगा ? निश्चित रूप से ऐसे आचरण से लोक व्यवस्था भंग हो जाएगी। राजदरबारों में तो ऐश्वर्य और गरिमा का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए। तुझे याद रखना चाहिए कि ऐश्वर्यशाली को ही इंद्र कहते हैं। इंद्रियां इंद्र तब बनती हैं जब वह अपने धर्म का पालन करने वाली बनती हैं अर्थात राग और द्वेष में नहीं फंसती हैं। जब दरबारों में राग और द्वेष की बात होने लगेंगी तो लोक धर्म अपमानित होगा। आम आदमी तभी धर्म का पालन करने वाला बना रह सकता है जब तेरे जैसे क्षत्रिय जिन धर्म का पालन करते हुए लोक व्यवस्था को गरिमा पूर्ण और ऐश्वर्या युक्त बनाए रखने के लिए संघर्ष करेंगे।
अर्जुन ! आज जब तू इस धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र में आकर खड़ा हो गया है अर्थात पापियों का अंत करने के अपने कर्तव्य पालन के लिए उद्यत होकर आया है तो तुझे यहां से पलायन कर रथ के पृष्ठ भाग में जाकर नहीं बैठना चाहिए, बल्कि अवसर को पहचान कर धर्म भंग करने वाले दुर्योधन जैसे पापी लोगों को दंडित कर समाज में धर्म की स्थापना करनी चाहिए। इसके लिए तुझे बड़े से बड़े आनंद को भी छोड़ देना चाहिए। मैं अपने इस निज धर्म की पालना करने के लिए मोक्ष के परम आनंद को भी त्यागने के लिए तत्पर हूं, तब तुझे भी ऐसा ही सोचना और मानना चाहिए अर्थात यदि मुझे मोक्ष हो गया हो परंतु लोक धर्म पालन करने की भी स्थिति मेरे सामने खड़ी हो गई हो तो मैं मोक्ष के स्थान पर लोकधर्म की पालना करने को अपना प्रथम कर्तव्य मानूंगा।
हे पार्थ! आज तू पलायनवादी बन रहा है और उस समय बन रहा है जब तू धर्म के निर्वाह के लिए परमपिता परमेश्वर की व्यवस्था में नियुक्त कर दिया गया है । ध्यान रखना कि तेरा यह पलायन संसार के कल्याण के लिए नहीं है। महात्मा जनों के कल्याण के लिए नहीं है बल्कि यह उनको और भी अधिक नारकीय जीवन जीने के लिए अभिशप्त कर देगा। पलायनवादी बनाकर अगर तू यह पाप अपने ऊपर लेना चाहता है तो तेरे से अधिक दुर्भाग्य किसी और का नहीं हो सकता।
भारत में धर्म का राज्य उन प्रकृति मित्र और धर्मप्रेमी ऋषियों, सम्राटों, साधुओं और सज्जनों के कारण युगयुगों तक इसलिए बना रहा कि वे सभी धर्म का राज्य स्थापित किये रखने को पुण्य और अधर्म का राज्य स्थापित करने को पाप मानते थे। उनके जीवन में सत्य था, सादगी थी, सरलता थी और जीवन को उत्कृष्टता में जीने की इच्छा शक्ति थी।
आज के विश्व समाज की समस्या यह है कि यहाँ अधिकांश लोग अधर्मानुकूल जीवन जी रहे हैं। हर एक व्यक्ति एक दूसरे के जीवन के लिए बोझ बन रहा है। ऐसा करके संसार के लोग अपने जीवन के बोझ को हल्का करने की भ्रान्ति पाले रखते हैं। पर वास्तव में वे अपने जीवन को ही बोझिल बना रहे होते हैं, क्योंकि दूसरों के साथ किये गये छल, कपट, घात- अपघात सभी उल्टे लौटकर लोगों के पास आ रहे हैं और उनके अदृश्य बोझ के नीचे लोग दबे हुए मरे जा रहे हैं। इससे साधुओं का अकल्याण और दुष्टों की वृद्धि हो रही है। साधुओं का अकल्याण से हमारा अभिप्राय सज्जनशक्ति की हानि से है। साधु का अभिप्राय गेरुवा वस्त्रधारी और किसी जटाधारी बाबा से नहीं है। यहाँ साधु का अभिप्राय हर उस व्यक्ति से है, जिसने जीवन को धर्मानुकूल बनाये रखने की पावन साधना की है और जो संसार के प्राणियों के कल्याण के कार्यों में लगा रहता है। उसके कपड़े सफेद भी हो सकते हैं और उसकी बेतरतीब बढ़ी हुई जटाएँ भी हो सकती हैं।
गीता के इन श्लोकों में यह तथ्य स्पष्ट किया गया है कि संसार में जब अनिष्टकारी शक्तियों का प्राबल्य होता है तो उस अनिष्ट से लड़ने वाली शक्तियों का भी तभी प्राकट्य भी होता है।
जब बढ़ता संसार में घोर पाप अनाचार।
तभी जन्मते महापुरुष दूर करें दुराचार ।।
उस समय सत्य को दबाव मुक्त करने के लिए और सज्जनशक्ति को तनावमुक्त करने के लिए प्रकृति उन शक्तियों का सृजन करती है जो संसार की बिगड़ी हुई व्यवस्था को पुनः ठीक करने की सामर्थ्य रखती हैं। इसी प्रकार की स्थिति को और संसार के एक शाश्वत सत्य को लोगों ने ‘अवतारवाद’ से जोड़कर देख लिया है। जबकि ऐसा मानना गलत है। संसार में ईश्वर का कभी भी अवतरण नहीं हो सकता। वह सर्वव्यापक है और सर्वत्र विद्यमान है, वह सब कुछ देख रहा है और सब कुछ सुन भी रहा है, यहाँ तक कि हमारी सन्ध्या में संसार के किसी भी व्यक्ति को यह पता नहीं होता कि हम क्या कह रहे हैं, और क्या माँग रहे हैं? पर वह परमपिता परमेश्वर हमारी उस मौनावस्था में भी हमारे मन की बात को सुनता रहता है। हमारे संवाद को वह उस समय भी सुनता है और कभी-कभी तो हमसे उल्टे बातें भी करने लगता है। उस आनन्दपूर्ण वार्ता को अनुभव तो किया जा सकता है पर उसे वर्णन नहीं किया जा सकता। ऐसे परमपिता परमेश्वर के बारे में यह भी सत्य है कि वह सन्ध्या में ऐसा नहीं है कि मेरे और आपके साथ ही रहता हो-वह उसी समय उन करोड़ों लोगों के साथ भी रहता है जो उस समय सन्ध्या कर भी रहे होते हैं या नहीं भी कर रहे होते हैं। इसीलिए वह सर्वव्यापक है, उस सर्वव्यापी को कभी भी किसी भी काल में संसार में आकर मानव रूप में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
श्रीकृष्णजी यहाँ जो कुछ कह रहे हैं उसका अभिप्राय केवल इतना ही है कि ईश्वरीय शक्ति संसार के प्रत्येक प्रकार के उपद्रव को शान्त करने और प्रत्येक प्रकार की चुनौती का प्रत्युत्तर देने की व्यवस्था करती है और वह अन्धकार को मिटाकर प्रकाश करने ‘के लिए संघर्ष करती रहती है। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन से अपेक्षा कर रहे हैं कि तू भी उपस्थित चुनौती का सामना कर। यदि तू ऐसा करता है तो मानना कि तू भी ईश्वरीय शक्ति का अंश बनकर ईश्वरीय व्यवस्था को धर्मानुकूल बनाने के लिए ईश्वरीय कार्यों का ही निष्पादन कर रहा है। यदि आज संयोगवशात् तुझे ईश्वरीय व्यवस्था को धर्मानुकूल बनाये रखने के लिए ईश्वरीय कार्य को करने का सौभाग्य मिल रहा है तो इसे खोने की मूर्खता मत कर। इसे अपना सौभाग्य मानते हुए पूर्ण मनोयोग से निभाने का प्रयास कर। तेरा ऐसा प्रयास इस संसार के लिए उपयोगी होगा, और इसमें व्याप्त अव्यवस्था को मिटाने में सहायता मिलेगी।
श्रीकृष्णजी कहते हैं कि संसार में ऐसे बहुत से लोग हैं जो राग, भय, क्रोध से युक्त होकर मुझ में लीन होकर अर्थात् मेरी शरण में आकर ज्ञान रूपी तप से पवित्र होकर मेरी ही भावना में आ मिले हैं। अर्जुन ! तुम्हें ध्यान रखना चाहिए कि संसार के लोग जिस भावना से मेरे पास आते हैं मैं उन्हें उसी भावना से अपनाता हूँ।
श्रीकृष्णजी का मानना है कि संसार के लोग यदि मेरे पास सकाम भाव से आ रहे हैं तो मैं उन्हें सकाम भाव से ग्रहण करता हूँ और यदि निष्काम भाव से आ रहे हैं तो मैं उन्हें निष्काम भाव से अपनाता हूँ। जिन लोगों की भावनाएँ अपने लिए कुछ माँगने की हैं उन्हें ईश्वर उसी प्रकार गले लगाते हैं और जो संसार के लिए कुछ माँग रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं-उनकी प्रार्थना को वह उसी रूप में सुनते हैं। इस पर सत्यव्रत सिद्धान्तालंकारजी कहते हैं-” श्रीकृष्ण का कहना है कि सकाम तथा निष्काम दोनों प्रकार के कर्म करने वालों का लक्ष्य तो भगवान है ही उसी की ओर मुँह उठाये सब चले जा रहे हैं, परन्तु सकाम कर्मियों की अपेक्षा निष्काम कर्मी ऊँचे सत्य की चट्टान पर खड़ा है। श्रीकृष्ण करते हैं कि मानव सृष्टि में मनुष्य को गुण कर्म के अनुसार कर्म करने में मैंने ही प्रवृत्त किया है, परन्तु मैं इस कर्म का कर्त्ता होते हुए भी, क्योंकि मैंने यह कर्म निष्कामता से किया है इसलिए मैं कर्त्ता होते हुए भी अकर्त्ता हूँ।”
हम पूर्व में ही बता चुके हैं कि योगेश्वर श्रीकृष्णजी जहाँ ‘मैं’ का प्रयोग कर रहे हैं वहाँ- वहाँ हमें ईश्वर का अर्थ समझना चाहिए। मानो गीता में आत्मा और परमात्मा का संवाद चल रहा है। एक परमयोगी का आत्मा परमात्मा के साथ मिलकर उसकी ओर से संसार के साधारण लोगों को उपदेश कर रहा है।

(डॉ राकेश कुमार आर्य )
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और बात को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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