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साठ-पैंसठ साल पुराना इंदौर याद आता है, तो आँखों के सामने ढाई-तीन लाख की आबादी वाला एक शांत, सुरम्य और हरा-भरा शहर तैर जाता है। चारों ओर फैले बाग-बगीचे, कुएँ-बावड़ियाँ, कल-कल बहते तालाब, मिलों की भोंपू और हाट-बाजारों की चहल-पहल… वो पुराना इंदौर सादगी और अपनत्व की मूरत था।
आज का इंदौर बहुमंजिला इमारतों, सीमेंट-कंक्रीट के जाल, चमचमाती सड़कों, मॉल कल्चर, नाइट लाइफ और फार्म-हाउस संस्कृति से अपनी नई पहचान गढ़ रहा है। तांगों और मिनी बसों का दौर पीछे छूट गया और शहर अब मेट्रो, फ्लायओवर तथा रिंग रोड के पहियों पर रफ्तार भर रहा है। जूनी इंदौर, जवाहर मार्ग, राजबाड़ा और पलासिया से निकलकर शहर दर्जनों गाँवों को अपनी गोद में समेटते हुए दूर-दूर तक फैल चुका है।
लेकिन शहर का कलेवर चाहे कितना भी बदल गया हो, इंदौरी दिल और यहाँ की तासीर आज भी वही है!
यहाँ वार-त्योहार मनाने का जोश अनूठा है। होली-रंगपंचमी की गैर हो या गरबे की रातें, रक्षाबंधन हो या प्रकाशोत्सव—इन्दौर हर उत्सव को दिल खोलकर जीता है। इसी सांस्कृतिक धरोहर की सबसे चमकदार कड़ी है—अनंत चतुर्दशी की विश्वप्रसिद्ध झांकियाँ!
लगभग सौ से अधिक वर्षों से चली आ रही यह परंपरा इंदौर की अस्मिता से जुड़ी है। मिल मजदूरों की लगन से शुरू हुई यह कला यात्रा आज भी उतनी ही जीवंत है। अनंत चतुर्दशी की पूरी रात शहर सोता नहीं है। रंग-बिरंगी विद्युत छटाओं से झिलमिलाती, पौराणिक और सामाजिक संदेश देती विशाल झांकियाँ जब सड़कों पर निकलती हैं, तो उन्हें देखने के लिए देश-विदेश से लाखों जनसैलाब उमड़ पड़ता है। ढोल-ताशों की थाप, अखाड़ों के शस्त्र-प्रदर्शन और झांकियों की यह झिलमिलाहट रात भर शहर को एक जादुई दुनिया में बदल देती है।
और जहाँ इंदौर की बात हो, वहाँ खान-पान का जिक्र न आए, यह तो हो ही नहीं सकता! सराफा की जगमगाती चौपाटी, छप्पन दुकान की रौनक, सुखलिया की मिठाइयाँ, राजबाड़ा, छावनी और मालवा मिल के मशहूर ठीये—ये सब खाने के शौकीनों के लिए जन्नत हैं। भुट्टे का कीस, दही-बड़ा, गर्म-गर्म कचौरी-समोसे, आलूबड़े, पोहा-जलेबी, गुलाब जामुन और 💖 गाजर का हलवा—इन स्वादों का आनंद हर इंदौरी की ‘याद गली’ में बसा हुआ है।
पुरानी सादगी और नई झिलमिलाहट का यह हसीन संगम ही तो हमारे इंदौर को दुनिया में सबसे अलग और मनभावन बनाता है!
– मदन वर्मा “माणिक”
इंदौर, मध्यप्रदेश
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