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(भारतीय संस्कृत नाट्यपरम्परा पर टिहरी गढ़वाल की संगोष्ठी आयोजित)
चन्द्रबदनी (नैखरी) टिहरी गढ़वाल: : उत्तराखण्ड संस्कृत संस्थानम्, हरिद्वार एवं श्रीदेव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय परिसर,चन्द्रबदनी (नैखरी) के संयुक्त तत्त्वावधान में संस्कृतमास महोत्सव के अन्तर्गत “भारतीय संस्कृत नाट्यपरम्परा” विषय पर आज दिनांक 22 सितम्बर 2026 को ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
संगोष्ठी में भारतीय संस्कृत नाट्य परम्परा की उद्भव यात्रा,शास्त्रीय आधार, साहित्यिक वैभव, रंगमंचीय स्वरूप,सांस्कृतिक चेतना एवं समकालीन प्रासंगिकता पर विद्वानों द्वारा विस्तृत विचार-विमर्श किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. महन्थ मौर्य प्र.निदेशक,श्रीदेव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय परिसर, चन्द्रबदनी (नैखरी) ने की।
उन्होंने कार्यक्रम को सभी के लिए अत्यन्त उपयोगी एवं ज्ञानवर्धक बताया।
कार्यक्रम में मुख्यवक्ता प्रो. रमाकान्त पाण्डेय,कुलपति उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय,हरिद्वार की गरिमामयी उपस्थिति रही।
उनके द्वारा भारतीय नाट्यपरम्परा केवल मनोरंजन की विधा न होकर भारतीय जीवन-दर्शन, लोकमंगल, नैतिक मूल्यों, सौन्दर्यबोध एवं सांस्कृतिक चेतना की सशक्त अभिव्यक्ति कहा गया। उन्होंने भरतमुनि के नाट्यशास्त्र, रस-सिद्धान्त,अभिनय,नाट्य के विविध अंगों और कालिदास,भास, शूद्रक एवं भवभूति आदि संस्कृत नाटककारों की रचनात्मक परम्परा का उल्लेख करते हुए संस्कृत नाट्य साहित्य की व्यापकता और विशिष्टता को रेखांकित किया। साथ ही उत्तराखण्ड की लोक परम्परा को भी वैदिक परम्परा अनु प्राणित बताया।
मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. हरिराम मिश्र,विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्र,जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली रहे।
उन्होंने कहा कि संस्कृत नाटकों में तत्कालीन समाज, राजनीति,संस्कृति, लोकजीवन और मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत कलात्मक चित्रण मिलता है। रस,भाव,चार प्रकार के अभिनय,संगीत, नृत्य एवं संवाद के समन्वय से विकसित भारतीय नाट्यपरम्परा ने भारतीय ज्ञान-परम्परा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया है।उन्होंने मुद्राराक्षस नाटक की नाटकीयता पर सोदाहरण विचार प्रस्तुत किये।
विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. अरविन्द नारायण मिश्र मुख्यशास्ता एवं शिक्षाशास्त्र विभाग उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय,हरिद्वार उपस्थित रहे। उन्होंने आधुनिक डिजिटल माध्यमों के युग में संस्कृत नाट्य साहित्य एवं रंगपरम्परा को नई पीढ़ी से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
वक्ता डॉ. शैलेन्द्र उनियाल, वेद-विभागाध्यक्ष,केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर, देवप्रयाग द्वारा भारतीय संस्कृत नाट्यपरम्परा के अन्तर्गत औपनिषदिक आख्यानों को प्रस्तुत किया गया।

संगोष्ठी के जनपद संयोजक एवं संचालक डॉ. मूलचन्द्र शुक्ल संस्कृत विभागाध्यक्ष द्वारा कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए भारतीय संस्कृत नाट्यपरम्परा की समृद्ध विरासत को जन-जन तक पहुँचाने के लिए ऐसे शैक्षणिक आयोजनों को आवश्यक बताया गया।
सहसंयोजक आचार्य रोशन गौड ने अतिथियों एवं विद्वानों का स्वागत किया।
कार्यक्रम में आनन्दा हिमानी, डॉ. नवीन जशोला, डॉ. मुदित शुक्ल,डॉ. आशीष त्रिपाठी,डॉ. अजीत पंवार,नाडू गोपाल, बप्पा दास,डॉ. प्रकाश जांगी, प्रो. प्रकाश पन्त,डॉ. कैलासपति मैठाणी एवं परिसर के समस्त प्राध्यापक सहित अनेक गणमान्यजन, शिक्षक,विद्यार्थी और शोधार्थी आदि उपस्थित रहे।
संस्थान द्वारा किये जा रहे संस्कृत के प्रचार प्रसार आदि के कार्यों को बताते हुए सचिव प्रोफ़ेसर विनय विद्यालंकार ने कहा कि संगोष्ठी के माध्यम से प्रतिभागियों को भारतीय ज्ञान परम्परा के एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण आयाम संस्कृत नाट्य साहित्य एवं भारतीय रंगमंच की विरासत को समझने का अवसर मिला है।
कार्यक्रम को संस्कृतमास महोत्सव के अंतर्गत भारतीय संस्कृति एवं संस्कृत भाषा के संरक्षण,संवर्धन और प्रचार-प्रसार की दिशा में एक सार्थक शैक्षणिक पहल के रूप में देखा जा रहा है ।
कार्यक्रम के अन्त में डॉ. दयाधर दीक्षित द्वारा सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया गया।
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