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विशाखापत्तनम, 19 जुलाई: : प्रख्यात आध्यात्मिक संत मुनि महेशानंद जी महाराज ने कहा कि सच्चा गुरु वह नहीं होता जो केवल शास्त्रों का ज्ञाता हो या अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाने में लगा रहे, बल्कि वह होता है जिसने स्वयं सत्य का साक्षात्कार किया हो और जिसकी उपस्थिति मात्र से शिष्य के भीतर भी सत्य की खोज, साधना और आत्मजागरण की प्रेरणा जागृत होने लगे।
उन्होंने कहा कि वास्तविक गुरु शिष्य को अपने व्यक्तित्व का अनुयायी नहीं बनाता, बल्कि उसे सत्य का साक्षी बनने की दिशा में अग्रसर करता है। सच्चे गुरु का उद्देश्य स्वयं की पूजा कराना नहीं, बल्कि शिष्य को आत्मनिर्भर, स्वतंत्र और उसके वास्तविक आत्मस्वरूप से परिचित कराना होता है।
मुनि महेशानंद जी महाराज ने कहा कि गुरु की पहचान उसके शब्दों से अधिक उसकी उपस्थिति से होती है। यदि किसी गुरु के सान्निध्य में मन में शांति, मौन, आनंद और ध्यान की अनुभूति होने लगे तथा जीवन में धर्म, भक्ति, प्रेम, करुणा, विवेक और सजगता का स्वाभाविक विकास होने लगे, तो यह सच्चे गुरु का लक्षण है।
उन्होंने बताया कि गुरु बाहरी कर्मकांडों की अपेक्षा ध्यान, जागरूकता और आत्मदर्शन पर अधिक बल देता है। आत्मिक उन्नति का मार्ग भीतर की यात्रा से होकर गुजरता है और गुरु उसी यात्रा का पथप्रदर्शक होता है।
उल्लेखनीय है कि मुनि महेशानंद जी महाराज अहर्निश तपस्या, साधना और आत्मचिंतन में निरंतर रत रहते हैं। उनके सान्निध्य में आने वाले श्रद्धालुओं और साधकों को आध्यात्मिक जीवन, तप, ध्यान और आत्मानुभूति की प्रेरणा प्राप्त होती है। उनके प्रवचनों से समाज में आध्यात्मिक जागरण, नैतिक मूल्यों और आत्मविकास का संदेश प्रसारित हो रहा है।
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