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कब क्या हो जाए…

 

कब क्या हो जाए

 

कोई नहीं जानता जग में,

कब किसको क्या हो जाए।

 

कब जीवन बसंत हो जाए,

कब पतझड़ सा झड़ जाए।

कब खुशियों की बारिश हो,

कब गम की धूप निकल आए।

 

कब तक पंछी उड़े गगन में

कब माटी में मिल जाए।

आज मिला था जो हँस हँसकर,

कल सदैव को खो जाए।

 

सांसों का ये हवा महल भी

पता नहीं कब ढ़ह जाए।

कब तक देह रहे चंदन सी,

कब चंदन संग जल जाए।

 

कर्म करो ऐसे कि हर सदी

सदां तुम्हारे गुण गाए।

कोई नहीं जानता है जग में

कब किसको क्या हो जाए।

गीतकार अनिल भारद्वाज एडवोकेट हाईकोर्ट ग्वालियर म.प्र. मोबा.9827304030.

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