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मित्र और शत्रु हमारे भीतर बैठे होते हैं। वेदों का अध्ययन कर लिया परंतु वेदों को आचरण में नहीं ला पाए तो सब व्यर्थ चला गया। रावण वेदों का विद्वान था परंतु आचरणहीन था।
रावण की भांति ही यदि आप भी वेदों को पढ़कर भी दूसरों को अपमानित करते रहे, क्रोध में भरकर अपने बने बनाए महल को अपने आप ही मिटाते रहे तो क्या लाभ हुआ ! कितने ही बड़े यज्ञ करो, कितने ही ग्रंथ पढ़ो ,कितने ही शास्त्र पढ़ो, जब तक आचरणशील नहीं हो तब तक उसका कोई लाभ नहीं।
कुकृत्य करने पर लगोगे तो जीवन हेय बन जाएगा। सुकृत्य करने पर लगोगे तो जीवन श्रेय मार्ग का पथिक बन जाएगा।
बुरे काम करने वालों के लिए चारों ओर से भर्त्सना बरसती है जबकि अच्छे काम करने वालों के लिए चारों ओर से आनंद की वर्षा होती है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने सत्कृत्य करने पर बल दिया है।
अपने ही कृत्य प्रतिफल के रूप में हमारे पास लौटते रहते हैं। जो कुछ भी हमको मिल रहा है वह अपने कर्मों के फल के रूप में मिल रहा है। हम व्यर्थ ही किसी अन्य को दोष देते हैं। ग्रह, दशा, देवी, देवता, भाग्य विधाता सभी निर्दोष हैं। इनको दोष देना व्यर्थ है।
दुनिया में कोई किसी का नहीं, यह कहना हमारी भूल है। सोचना चाहिए कि हम किसके अपने हैं ? जिसके आप अपने हो उधर से आपको अपनत्व मिलना निश्चित है। हम अपने आप किसी के नहीं हो पाए,यही हमारे दुखों का कारण है। संसार में अपनत्व का विस्तार करने के लिए बाँहों को खोल दीजिए। स्मरण रखिए कि प्रेम की पराकाष्ठा ही धर्म है। प्रेम की पराकाष्ठा पर हम पहुंचे नहीं, बहुत नीचे रहकर ही हम प्रेम का प्रतिफल पाने की इच्छा पाल बैठे। यही हमारी भूल रही।
वातावरण और परिस्थितियों के निर्माता हम स्वयं होते हैं। ये दोनों हमारे पास नहीं आते हम ही इनको बना लेते हैं। उद्यान में गुबरीला भी रहता है और भौंरे भी रहते हैं। भौंरे फूलों पर बैठते हैं और मकरंद पान करते हैं जबकि गुबरीला गंदगी तलाश करता है।दूसरों के व्यक्तित्व की सुगंध ढूंढो। भौंरे बन जाओगे। दूसरों के व्यक्तित्व की दुर्गंध ढूंढोगे तो गुबरीला बन जाओगे।
चिंतन जिसका निम्न हो उसका निम्न नसीब ।
दुनिया का समझो उसे सबसे बड़ा गरीब।।
एक ही सांचे में ढाली गई ईंटों को देखिए। कोई मंदिर में काम आती है तो कोई गंदी नाली में काम आती है। एक ही खान के पत्थर को देखिए कोई मंदिर की मूर्ति में काम आता है तो कोई टॉयलेट में प्रयोग होता है। एक ही गुरु के शिष्यों को देखिए एक वेदों का विद्वान बन जाता है तो एक डकैत, बलात्कारी, हत्यारा अर्थात अपराधी बन जाता है।
अपनी दिशा का निर्धारण अपने आप कीजिए। अपने उद्धारक अपने आप बनो। जिस दिशा में चल पड़ोगे, उसी दिशा के साथी मिलते चले जाएंगे। चोर को चोर मिलते जाएंगे और संत को संत मिलते चले जाएंगे।
जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। अपनी आंखें सही हैं तो सारा संसार सही दिखाई देता है। आंखों में दोष है इस संसार की दोषों से भरा दिखाई देता है।महात्मा बुद्ध राजमहल छोड़कर आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए वन में चले गए अंतर्मुखी होकर अपने भीतर छिपी हुई महान सत्ता और महत्ता के दर्शन किए, इतना होते ही वह राजकुमार से बदलकर ‘भगवान ‘ अर्थात महामानव हो गए।
संसार में जितने भर भी महात्मा महापुरुष हुए हैं ,उन सब ने वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना के लिए कार्य किया है। महात्मा बुद्ध ने भी अपने मौलिक चिंतन में वेद को पुनर्स्थापित करने के लिए संघर्ष किया। आगे चलकर ईसा मसीह ने भी यही किया, यहां तक कि मोहम्मद साहब ने भी यही किया। यह अलग बात है कि वेदों का तात्विक ज्ञान न होने के कारण उनका ज्ञान दूसरी दिशा में बह गया। जो कालांतर में वैदिक धर्म का ही शत्रु हो गया।
अधूरा ज्ञान बड़ा घातक होता है। जिसका ज्ञान अधूरा होता है, वह संसार के लिए कल्याणकारक नहीं होता। नदी जहां सबसे अधिक गहरी होती है , वहां उसके पानी का कोलाहल रुक जाता है। जहां नदी उथलेपन में बहती है वहीं पर अधिक शोर करती है। थोथा चना बाजे घना।
जिसका ज्ञान गहराई वाला नहीं होता वह दूसरों को चैलेंज करता फिरता है। दूसरों के सामने जंघा में हाथ मारता है। जिनके ज्ञान में गहराई है,गंभीरता है,वह दूसरों को चुनौती नहीं देता बल्कि दूसरों पर कृपा करता है, दूसरों का हाथ पकड़ता है और साथ लेकर चल पड़ता है। उन्नति की ओर… प्रगति की ओर… महान लक्ष्य को पाने के लिए।
अपने आप को पहचानो। अपने स्वरूप को पहचानो। जो लोग अपने आप को नहीं पहचान पाए वही हेय जीवन जीते हैं। दुष्प्रवृत्तियों में लिपटे हुए नरक भोगते रहते हैं। अपने आप को ईश्वर का युवराज समझो।
अहम् ब्रह्मास्मि का अर्थ अहंकार शून्य हृदय को प्राप्त कर लेना है। ऐसी अवस्था में साधक जानता है कि मैं ब्रह्म नहीं हूं। पर वह ब्रह्म के आनंद को प्राप्त करके अपने आप को उस आनंद में लीन कर लेता है। तब उस अहंकारशून्य हृदय से यह पवित्र शब्द निकलता है – अहं ब्रह्मास्मि।
जो अपने आप को ईश्वर का युवराज मान लेता है वह अपने व्यक्तित्व को देवों के समान गढ़ने लगता है। वह पशु पक्षियों की तरह पेट प्रजनन तक सीमित नहीं रहता, वह विश्व उद्यान को समुन्नत और सुसंस्कृत बनाने में लग जाता है।
तुच्छ से महान, लघु से विभु और नर से नारायण बनने की साधना करो। अभी हमने महान बनने की साधना नहीं की है।साधना नहीं की है तो लोगों की भावना भी हमारे साथ जुड़ी नहीं है। भावना नहीं जुड़ी है तो भगवान ने प्रार्थना सुनी नहीं है।
मनुष्य पता नहीं क्या-क्या खोज कर रहा है? परंतु अपने आप को नहीं खोज रहा, अतीत में वह जो कुछ था वह आज नहीं है और जो आज है वह आने वाले कल में नहीं रहेगा। जिसे वह प्रगति कह रहा है वह उसकी प्रगति नहीं दुर्गति है।
हम मस्तिष्क को उज्जवल ,हृदय को विशाल और दिनों को शुभ बनाते चलें और लोकहित में काम करते रहें तभी हमारी महानता की साधना प्रबल होगी।
किसी की आलोचना से विचलित मत होइए। न्याय के पथ पर आगे बढ़ते जाइए। समय का मूल्य समझिए। आपके पास समय थोड़ा है, काम अधिक है। जो लोग आप पर भोंकते हैं, वह अपने व्यक्तित्व का अपने आप परिचय देते हैं। हो सकता है अपने बनाए हुए महल का अपने आप विध्वंस कर रहे हों। उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना करो कि उन्हें ईश्वर सद्बुद्धि प्रदान करें। अपने लक्ष्य पर निशाना साधिए और उसी की तरफ आगे बढ़ते रहिए।
(डॉ राकेश कुमार आर्य )
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