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इच्छाओं का भी अपना
एक होता है चरित्र
*खुद के मन की हो तो ठीक..
नहीं तो वो लगती हैँ बहुत ही विचित्र….
अपने मन की है तो बहुत अच्छी लगती हैँ..
वहीं दूसरे के मन की हों तो थोपी हुई लगती हैँ…
फिर वो बहुत ही खटकती है…
आगे चलकर बहुत ही समस्या पैदा करती हैँ…
इच्छायें होती हैँ बहुत ही अनंत असीमित
होती नहीं इन इच्छाओं की कोई भी लिमिट…
जिनको पूरी करने में इंसान की
बीत जाती है पूरी उम्र…
न फिर भी नहीं पूरी कर पाता है
वो अपनी इच्छायें ता उम्र…
बचपन में माता पिता
पूरी करते है हमारी इच्छायें..
आगे ज़ब पड़ जाती है जिम्मेदारी…
फिर मैडम और
बच्चों की जिम्मेदारी
उनकी इच्छायें पूरी करते -करते
निकल जाती है उम्र सारी..
अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर…
क़र्ज़ के बोझ में आकंठ तक डूबकर..
पूरी करते हैँ सबकी इच्छायें
लेकिन कोई नहीं पूँछता अंत तक हमारी इच्छायें…
फिर एक दिन अंत आता है
तो हो जाता है सब अंत, सबका अंत….
न इंसान न इच्छायें
खाक में मिल जाते हैँ सारे सपने….
रह जाती हैँ दिल की दिल में हीं
“वे ” अपूर्ण इच्छायें…
आर डी बाजपेई
संपादक
जेडी न्यूज़ विज़न
लखनऊ….
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