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(डॉ राकेश कुमार आर्य)
नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (सितंबर 2026) में भारत को स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, यूपीआई एकीकरण और आतंकवाद के खिलाफ कड़े संदेश जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक और कूटनीतिक लाभ मिले हैं, हालांकि चीन-रूस के पश्चिमी-विरोधी रुख और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता पर स्पष्ट आश्वासन न मिलने जैसी सीमाएं और चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। इसके उपरांत भी यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि मोदी सरकार के कटु आलोचक रहे भाजपा के पूर्व नेता यशवंत सिन्हा ने भी इस शिखर सम्मेलन को महत्वपूर्ण माना है और पहली बार मोदी सरकार की प्रशंसा करते हुए कहा है कि इस शिखर सम्मेलन के सकारात्मक प्रभाव रहे हैं।
पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने नई दिल्ली में आयोजित BRICS समिट 2026 को भारत की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया है। मोदी सरकार के मुखर आलोचक माने जाने वाले सिन्हा ने इस सम्मेलन की सफलता को मुख्य रूप से तीन बिंदुओं में समझाया है:
शीर्ष नेताओं की उपस्थिति: सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति समेत सभी आमंत्रित राष्ट्राध्यक्षों का भारत पहुँचना और कार्यवाही में हिस्सा लेना सबसे बड़ी सफलता रही।
संयुक्त घोषणापत्र: तमाम मतभेदों के बावजूद, इस बार अधिकारियों की कड़ी मशक्कत से सर्वसम्मति से एक साझा (संयुक्त) घोषणापत्र जारी हुआ, जो मई में हुई विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान संभव नहीं हो पाया था।
द्विपक्षीय बैठकें: भारत ने विभिन्न देशों के नेताओं के साथ महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ताएँ कीं और कूटनीतिक मोर्चे पर अपनी भूमिका सफलतापूर्वक निभाई।
चीन और कूटनीति पर अन्य विचार:
चीन पर अविश्वास: चीन के साथ बातचीत जारी रखने पर जोर देते हुए उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हम चीन पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर सकते, क्योंकि उसने लगातार भारत को परेशान किया है।
पारंपरिक विदेश नीति: इजराइल-फिलिस्तीन और गाजा के मुद्दे पर भारत अपने पुराने और पारंपरिक रुख पर कायम रहा, जिसे उन्होंने देश की कूटनीति के लिए सकारात्मक बताया।
नई दिल्ली के भारत मंडपम में 12 से 13 सितंबर 2026 को 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। इस सम्मेलन की थीम “रेसिलिएंस (लचीलापन), इनोवेशन (नवाचार सहयोग और स्थिरता” थी। 11 सदस्य देशों और कई मेहमान देशों की मौजूदगी वाले इस मंच पर भारत ने मेजबानी की। भारत के परंपरागत शत्रु अमेरिका और पाकिस्तान सहित कई ऐसे देश रहे जो इस शिखर सम्मेलन को किसी भी प्रकार से फ्लॉप करने का इंतजार कर रहे थे। चीन के नेता शी जिनपिंग भारत आए तो सही परंतु उनकी भी कोशिश यही थी कि भारत इस शिखर सम्मेलन के बाद उभरकर न आना चाहिए।
ब्रिक्स मंच पर भारत की कूटनीति मुख्य रूप से आर्थिक सुगमता, ऊर्जा सुरक्षा और ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) के हितों पर केंद्रित रही। डिजिटल भुगतान और स्थानीय मुद्राओं में व्यापाररुपये और स्थानीय मुद्राओं में कारोबार: ब्रिक्स देशों के बीच आपसी व्यापार अब डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं (रुपया, रूबल, युआन, दिरहम) में आसान किया गया है।
यूपीआई का विस्तार: भारत अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और यूपीआई को अन्य ब्रिक्स देशों के साथ जोड़ने की तैयारी में है।
आर्थिक बचत: इससे भारतीय कंपनियों और छोटे उद्योगों को करेंसी एक्सचेंज और ट्रांजैक्शन फीस में अरबों डॉलर की सीधी बचत होगी।
आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख
भारत ने ब्रिक्स घोषणापत्र में आतंकवाद और टेरर फंडिंग के खिलाफ कड़े प्रतिबंध लगाने की बात को मजबूती से रखवाया। अपनी इस मांग के माध्यम से भारत ने सीधा पाकिस्तान को निशाने पर लिया। भारत की धरती पर हुए वृक्ष शिखर सम्मेलन में आतंकवाद पर जो कुछ भी बोला गया उसको सुनकर पाकिस्तान को मिर्ची लगती स्वाभाविक थी।वित्तीय कार्रवाई कार्य बल के मानकों का कड़ाई से पालन करने पर सहमति बनी है।
रूस, यूएई और सऊदी अरब जैसे ऊर्जा से भरपूर देश ब्रिक्स का हिस्सा हैं। ऊर्जा सहयोग मजबूत होने से भारत को कच्चे तेल और गैस की सप्लाई सुरक्षित रखने में मदद मिलती है।
ब्रिक्स लॉजिस्टिक सप्लाई चेन फ्रेमवर्क से भारत को वैकल्पिक कच्चे माल के स्रोत और नए बाजार मिले हैं।
ग्लोबल साउथ की आवाज और कूटनीतिक संतुलन
भारत ने विकासशील देशों के हितों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग को जोरदार तरीके से उठाया।इस मंच ने भारत को अमेरिका, रूस और चीन के बीच रणनीतिक संतुलन बनाने का एक बेहतरीन अवसर दिया।
भारत के लिए हानियाँ, सीमाएँ और चुनौतियाँ
हालाँकि भारत को कई कूटनीतिक और आर्थिक लाभ मिले, लेकिन इस बहुपक्षीय मंच की कुछ सीमाएं और नुकसान भी हैं।
1. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता पर स्पष्टता का अभाव
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है।
दिल्ली घोषणापत्र में भाषा को संतुलित रखा गया, लेकिन भारत की स्थायी सदस्यता के लिए कोई स्पष्ट और ठोस वादा नहीं किया गया। यह भारत के लिए एक पुरानी कूटनीतिक सीमा है जो इस बार भी बरकरार रही।
2. चीन और रूस का पश्चिमी-विरोधी रुख
रूस और चीन ब्रिक्स को एक ऐसे मंच के रूप में ढालना चाहते हैं जो स्पष्ट रूप से पश्चिमी देशों (अमेरिका और यूरोप) के विरोध में हो।
भारत के पश्चिमी देशों के साथ भी गहरे सामरिक संबंध हैं। ऐसे में, ब्रिक्स के जरिए किसी ‘एंटी-वेस्टर्न’ खेमे में खींचे जाने का जोखिम भारत के लिए कूटनीतिक सिरदर्द बन सकता है।
3. आम सहमति की मजबूरी और पाकिस्तान का नाम न होना
ब्रिक्स में फैसले आपसी सहमति से होते हैं। यही वजह है कि आतंकवाद की निंदा तो की गई, लेकिन क्रॉस-बॉर्डर आतंकवाद के लिए सीधे तौर पर पाकिस्तान का नाम घोषणापत्र में नहीं आ सका। इससे भारत की आतंकवाद के खिलाफ आक्रामक मांगें थोड़ी कमजोर पड़ जाती हैं।
4. ठोस नतीजों पर संशय
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों (जैसे कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम) का मानना है कि ब्रिक्स सम्मेलनों से कई बार जमीन पर उतरने वाले बहुत ठोस भू-राजनीतिक फायदे तुरंत नहीं दिखाई देते, और घोषणाएं कागजी ज्यादा लगती हैं।
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा और नाना पाटोले ने सवाल उठाया कि ब्रिक्स घोषणापत्र या बैठकों में लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में चीन द्वारा कब्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण का कोई स्पष्ट जिक्र नहीं किया गया। क्या प्रधानमंत्री ने चीन से भारतीय सेना की गश्त और पीछे हटने को लेकर कड़े सवाल पूछे? पार्टी का कहना है कि यदि क्षेत्रीय और प्रादेशिक सुरक्षा पर बात नहीं की जाएगी, तो ब्रिक्स केवल व्यापार को बढ़ावा देने का मंच बनकर रह जाएगा।
आम जनता को फायदा: कांग्रेस ने भव्य आयोजनों की सफलता के दावों पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि इससे देश की आम जनता और नागरिकों को वास्तविक कूटनीतिक या आर्थिक लाभ कितना मिलेगा।
भोजन की पसंद का मुद्दा: ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के डिनर में पूरी तरह शाकाहारी भोजन परोसे जाने पर कांग्रेस ने आपत्ति जताई और आरोप लगाया कि भाजपा सरकार मेहमानों पर अपनी खान-पान की पसंद थोप रही है।
ब्रिक्स समिट 2026 की मेजबानी और इसके परिणाम भारत के लिए मिला-जुला अनुभव रहा है। आर्थिक मोर्चे पर लोकल करेंसी ट्रेड, यूपीआई एकीकरण और सप्लाई चेन के स्तर पर भारत को स्पष्ट लाभ हुआ है। वहीं दूसरी ओर, भू-राजनीतिक स्तर पर चीन के साथ तनावों के बीच संवाद का अवसर मिलने के बावजूद, पश्चिमी देशों के साथ संतुलन बनाए रखना और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मनचाहा समर्थन न मिलना भारत की बड़ी चुनौतियाँ हैं। निश्चित ही इस क्षेत्र में भारत को भी और कुछ परिश्रम करने की आवश्यकता है। कुल मिलाकर, ब्रिक्स भारत के लिए अपनी वैश्विक स्वायत्तता बनाए रखने का एक उपयोगी माध्यम है, बशर्ते इसका उपयोग किसी एक धड़े के खिलाफ न हो।
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