आ गये चक्र सुदर्शनधारी…..

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आ गये चक्र सुदर्शनधारी

 

धरा पर आए मुरली वाले

खुल गए जेल के ताले।

 

हो रही थी रिमझिम बरसात

अनौखी द्वापर युग की बात

अष्टमी भादों की थी रात

आ गये बालकृष्ण मतवाले।

 

खुल गए जेल के ताले।

 

कंस का था जो करागार

सो गये उसके पहरेदार

विष्णु का ले अष्टम अवतार

जेल में जन्मे बंशी वाले।

 

खुल गए जेल के ताले।

 

तेज थी जमुना की जलधार

और जाना था नदिया पार

न मानी वासुदेव ने हार

रखे डलिया में बंशी वाले।

 

खुल गए जेल के ताले।

 

टोकरी से लटकाया पांव

नदी ने छू कर किया प्रणाम

छोड़ कर आये अपना धाम

क्षीरसागर में रहने वाले।

 

खुल गए जेल के ताले।

 

रंग गोरा था ना काला

पहन कर बैजंतीमाला

नंद घर आये नंदलाला

बांसुरी मधुर बजाने वाले।

 

खुल गए जेल के ताले।

 

सांवरे के घुंघराले बाल

चलें वे ठुमक ठुमक कर चाल

यशोदा के नटखट नंदलाल

चुराकर माखन खाने वाले।

 

खुल गए जेल के ताले।

 

राधिका बरसाने वारी

जिस पर दिल हारे बनवारी

आ गये चक्र सुदर्शन धारी

जगत का जिया चुराने वाले।

 

खुल गए जेल के ताले।

 

 

 

 

 

 

 

 

गीतकार अनिल भारद्वाज एडवोकेट

हाईकोर्ट ग्वालियर मध्यप्रदेश

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