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अजब सी कशिश है, तुम्हारी इन आँखों में,
हम तो कब के बहक चुके हैँ , इन आँखों में,
तुम्हारे हुस्न का इरादा समझ नहीँ पाए हम..
डूबते चले गये हम और हमारा वज़ूद तुम्हारी इन आँखों में..
क्या ही कहें अब अपने दिल का हाल..
सब कुछ डूब गया बचा नहीं अब कुछ..
सँभाल कर रखा है हमने दिल में इन आँखों को…
तुमको नज़र न लग जाय किसी और की ..
बसा लिया है हमने भी अपनी आँखों में तुम्हारी आँखों को..
कभी हमारी नज़र से भी आइना देख लिया करो तुम..
अजीब सी एक कशिश है तुम्हारी आँखों में..
यही दुआ है ऊपर वाले से
बसे रहो हमेशा तुम हमारी आँखों में…..
आर डी बाजपेई
संपादक
जनोदय न्यूज़ विज़न
लखनऊ
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