ओडिशा के जंगल में मिले 5 ‘महावानर’, इंसानों से 95% मैच करता है DNA; लंबा समंदर पार कर आखिर इंडोनेशिया से भारत कैसे पहुंचे?

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आपने अक्सर सुना होगा – हम इंसानों के पूर्वज वानर थे. वानर, यानी वन में रहने वाला नर. आज भी कई ऐसे वानरों की प्रजातियां हैं,जिनसे हम इंसानों का जीन 90 से 96 फीसदी तक मिलता है.

ये वैज्ञानिक प्रयोगों में साबित तथ्य है. वानरों की एक ऐसी ही प्रजाति है – ओरंगुटान, जिनके 5 बच्चे ओडिशा के बालासोर जिले के जंगलों में पाए गए हैं.

ओरंगुटान एक दुर्लभ प्रजाति वानर हैं. इनका मूल स्थान भारत नहीं, बल्कि दक्षिण पूर्व एशिया के इंडोनेशिया, मलेशिया और फिलिपींस जैसे देश हैं. लेकिन ये पांच ओरंगुटान भारत के ओडिशा के जंगलों में कैसे पहुंच गए? इससे पहले भारत में एक ही ओरंगुटान लाया गया था. नाम था बिन्नी. लेकिन 2019 में ओडिशा के ही नंदनकानन रिजर्व फॉरेस्ट में उसकी मौत हो गई. उसके सात साल बाद उसी जंगल में 5 ओरंगुटान मिले हैं.

ओडिशा के जंगलों में मिले 5 ओरंगुटान….

ओडिशा के वन अधिकारी और वन्य जीव विशेषज्ञ हैरान हैं कि ओडिशा तक ये ओरंगुटान पहुंचे कैसे? इसमें एक नर और मादा ही वयस्क हैं. बाकी उनके तीन बच्चे हैं. इसकी जांच चल रही है, ज्यादा मुमकिन है कि ये किसी एनिमल स्मग्लिंग ग्रुप के जरिए यहां लाए गए और पकड़े जाने के डर से छोड़ दिए गए.

 

एक साथ 5 ओरंगुटान का ओडिशा के जंगलों में मिलना, ये किसी उपहार से कम नहीं. ओरंगुटान एशिया के इकलौते ग्रेट एप, यानी महावानर है. ओरंगुटान नाम मलय भाषा से आया है. जिसमें ओरंग का मतलब इंसान और हुटान का मतलब जंगल होता है. इसलिए भारतीय परंपरा की तरह मलय क्षेत्र में भी इन्हें जंगलों में रहने वाला इंसान कहा जाता है. लेकिन ओरंगुटान आज इंसान के सबसे करीबी रिश्तेदारों में से एक होने के बावजूद विलुप्त होने के कगार पर कैसे पहुंच गए? समझिए आज के जी स्पेशल में.

 

धरती पर करीब डेढ़ करोड़ साल से है ओरंगुटान वानर वंश. उस दौर के विशाल वानरों की तुलना में ये आकार में छोटे थे. इनका मूल स्थान अफ्रीका के जंगलों में था, लेकिन विशाल वानरों के टकराव की वजह से इन्होंने अपने पूर्वजों से अलग एशिया में अपना आशियाना बनाया.

 

इंडोनेशिया और मलेशिया में है मूल स्थान

 

तब से ये एशिया के इंडोनेशिया और मलेशिया के जंगलों में ही पाए जाते हैं. यहां से कभी इधर उधर नहीं जाते. यही इनका स्थाई और एक मात्र ठिकाना है.

 

उसी दुर्लभ ओरंगुटान वानरों की ये वंशबेल ओड़िशा के जंगलों में भटकती पाई गई. एक नहीं, झुंड में पांच ओरंगुटान एक साथ मिले.

 

ऐसे बंदर बालासोर जिले में या नंदनकान रिजर्व फॉरेस्ट में भी देखने को नहीं मिले थे. लिहाजा इन पांच ओरंगुटान को देखते ही भीड़ जमा हो गई. देखने में तो ये वानर ही है, लेकिन ऐसी काया और चेहरे मोहरे वाले…?

 

नंदन कानन जूलॉजिकल पार्क के उपनिदेशक प्रदीप मिरासी ने बताया, ‘हमारी PRF टीम ने पांचों ओरंगुटान को रेस्क्यू किया. इन्हें रेस्क्यू करने के बाद हमने सभी पांचों ओरंगुटान की स्वास्थ्य जांच की. वजन से लेकर इनके नर मादा होने की पुष्टि की. पूरी साफ सफाई के बाद हमने इन्हें क्वारंटाइन सेंटर में रख दिया.’

 

जैसा कि नंदनकानन जूलॉजिकल पार्क के डिप्टी डाइरेक्टर प्रदीप मिरासी ने बताया, ‘जंगल के कोने में पाए जाने के बाद पांचों के पांचों ओरंगुटान बेहद कमजोर और कुछ को हल्का बुखार भी था. इन्हें सुरक्षित रूप से क्वारंटाइन सेंटर में रखने के बाद आगे की जांच चल रही है.’

 

रेस्क्यू कर सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया

 

बालासोर के डिस्ट्रिक्ट फॉरेस्ट ऑफिसर इंदालकर प्रतीक प्रकाश ने बताया, ‘हमारी टीम जब पहुंची, तो उसने इनकी पहचान ओरंगुटान के रूप में की. हमारे जाने के बाद बहुत सारे लोग इन्हें देखने आ रहे थे. इसलिए हमें इन्हें रेस्क्यू कर सुरक्षित स्थान पर ले जाना पड़ा. जहां से हमने इन्हें रेस्क्यू किया, वो भोगराई ब्लॉक में बड़ापाई गांव के पास है.’

 

5 ओरंगुटान्स को रेस्क्यू करने के बाद अब वन अधिकारियों के सामने चुनौती ये जानने की है कि आखिर बालासोर के जंगलों में ये ओरंगुटान आए कहां से. यहां कब से रह रहे हैं और अब इन्हें नए माहौल में कैसे ढाला जाए. इसकी वजह ये है कि नंदनकानन या आस पास के PRF फॉरेस्ट में ओरंगुटान जैसी प्रजातियों के लायक महौल नहीं है. हालांकि, इन दुर्लभ जीवों के पाए जाने के बाद ओडिशा सरकार भी एक्टिव हो गई है.

 

ओडिशा के वन एवं पर्यावरण मंत्री गणेश राम सिंह कुंतिया ने कहा कि इंटरनेशनल रैकेट से बचाने के लिए फिलहाल इन वानरों को नंदन कानन में रखा जाएगा. इसके बाद उन्हें चिड़ियाघर में स्थानांतरित कर दिया जागा.

 

ओडिशा सरकार और वन विभाग ने पूरी तैयारी की है कि इन पांच दुर्लभ ओरंगुटान्स को कोई स्वास्थ्य या अनजान माहौल वाली दिक्कत नहीं. फिलहाल ये क्वारेंटाइन में हैं. जहां इनकी नियमित मेडिकल जांच की जा रही है. इसके साथ स्मगलिंग पर नजर लखने वाली वाइल्ड लाइफ क्राइम ब्रांच को ये जिम्मेदारी दी गई है कि वो इसमें स्मगलिंग की भूमिका की भी जांच करें.

 

मनुष्यों से मिलते हैं 95 फीसदी जीन

 

ये ओरंगुटान्स अगर किसी स्मगलिंग नेटवर्क के जरिए यहां लाए गए हैं तो फिर वो गैंग, यहां से कुछ जानवरों को दूसरे देशों में ले जाता होगा, जिसका पता लगाना जरूरी है. वैसे भी ओरंगुटान दुनिया के तीन से चार देशों में ही पाए जाते हैं. इसलिए ये दुर्लभ श्रेणी में आते हैं. इंसानों के सबसे नजदीकी प्रजाति होने के कारण ये धरती पर मानव की विकास प्रक्रिया के अध्ययन में भी बेहद अहम माने जाते हैं.

दुनिया भर के जैव विशेषज्ञ आज भी ओरंगुटान समेत चिपांजी और गोरिल्ला जैसे वानर प्रजातियों की स्टडी से मानव विकास का क्रम समझने में जुटे है.

सवाल है कि ओरंगुटान इंसानों के सबसे करीबी रिश्तेदार क्यों कहे जाते हैं? क्या सिर्फ 95 फीसदी तक जीन इंसानों से मिलने की वजह से या फिर इन्हें हाव भाव, सूझबूझ और आपसी संचार सिस्टम में भी कुछ ऐसी खासियतें हैं, जो मौजूदा वानर प्रजातियों में इन्हें सबसे तेज दिमाग वाला माना जाता है. इन सारे सवालों के जवाब बेहद दिलचस्प हैं.

ओडिशा में जो 5 ओरंगुटान मिले हैं, उनमें से 3 बच्चे हैं. पूरी तरह से मैच्योर नहीं हैं. इसलिए नए माहौल में इन्हें बचाए रखना बेहद चुनौतीपूर्ण है. ये इसलिए भी कि इनकी प्रजाति का पता करना अभी बाकी है. पहले पूरे ओरंगुटान को एक ही प्रजाति का वानर माना जाता था. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जब इनकी प्रजातियों पर शोध हुए तो इनमें तीन प्रकार के ओरंगुटान की वंशबेल अलग पाई गई.

ओरंगुटान की मिलती हैं 3 प्रजातियां

 

एक ओरंगुटान, 3 प्रजातियां

 

1. बोर्नियन ओरंगुटान (Pongo pygmaeus)

 

इंडोनेशिया के बोर्नियो द्वीप मलेशिया के वर्षा वनों में पाए जाते हैं. इनकी तादाद 1 लाख के करीब मानी जाती है.

 

2. सुमात्रान ओरंगुटान (Pongo abelii)

 

ये इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के उत्तरी हिस्से में पाए जाते हैं. इनकी संख्या करीब 14 हजार बताई जाती है.

 

3. तपनुली ओरंगुटान (Pongo tapanuliensis)

 

ये सबसे नई प्रजाति है, जिसकी पुष्टि 2017 में हुई. सुमात्रा के बाटंग टोरू क्षेत्र में पाए जाते हैं. ये सबसे दुर्लभ हैं. इनकी संख्या सिर्फ 800 से है.

 

ओरंगुटान की तीनों प्रजातियों में एक बात जो कॉमन है, वो है इनका निवास स्थान. ये दक्षिण-पूर्व एशिया के वर्षा वनों में ही पाए जाते हैं. जमीन से ज्यादा समय पेड़ों पर बिताते हैं. इसलिए इन्हें पेड़ों पर रहने वाले सबसे सबसे बड़े स्तनधारी जीव कहा जाता है.

 

होते हैं बुद्धिमान, करते हथियारों का इस्तेमाल

 

ओरंगुटान बहुत बुद्धिमान होते हैं. वे औजार बनाते और इस्तेमाल करते हैं. जैसे छड़ी से दीमक या शहद निकालना, पत्तों को छतरी या दस्ताने की तरह इस्तेमाल करना. कांटेदार फल खोलने के लिए पत्तों का सहारा लेना. कुछ अध्ययनों में वैज्ञानिकों ने पाया कि ये पत्थरों का हथौड़े की तरह इस्तेमाल भी करते हैं.

 

ओरंगुटान्स की जीवन शैली पर कई चौंकाने वाली स्टडी हुई है. वर्षा वनों में रहने के कारण ये बारिश से सुरक्षा के लिए ये पेड़ पर ही एक घोंसला बना लेते हैं. इसके अंदर पानी नहीं जा पाता. कभी कभी घनी टहनियों को जोड़कर छत भी बना लेते है. एक स्टडी के मुताबिक, एक एडल्ट ओरंगुटान 250 से ज्यादा खाद्य सामग्रियों को उनके स्वाद के साथ याद रखता है. कुछ ओरंगुटान आपस में बातचीत करने के लिए साइन लैंग्वेज का भी इस्तेमाल करते हैं. कई बार खुद के जख्मों का इलाज भी खुद कर लेते हैं.

 

ओरंगुटान की क्यों होती है तस्करी?

 

सवाल है कि तस्कर इनकी स्मगलिंग क्यों करते हैं? ओरंगुटान मूल रूप से फलाहारी, शाकाहारी जीव होते हैं. ये खाने पीने की चीजों का इतना ध्यान रखते हैं कि अपने मूल स्थान में संक्रमण से बीमारी इन्हें न के बराबर होती है. एक व्यस्क नर या मादा ओरंगुटान 50 साल तक जी लेता है. अगर जंगल से अलग किसी संरक्षित जगह रखा जाए, तो ये उससे ज्यादा लंबी उम्र भी जा सकता है. लेकिन असली खतरा इनका जीवन नहीं, बल्कि इनकी कुछ खास विशेषताओं पर स्मगलर्स की नजर है.

 

दरअसल मादा ओरंगुटान 7 से 8 साल में एक ही बच्चे को जन्म देती है. इसलिए इनकी तादाद उतनी ज्यादा नहीं बढ़ती. लेकिन 6 साल की उम्र तक मादा ओरंगुटान अपने बच्चे की रक्षा जान पर खेलकर भी करती है. इसलिए कोई स्मगलर अगर किसी ओरंगुटान के बच्चे को हटाना चाहता है, तो उसे मादा ओरंगुटान को मारना पड़ता है. यानी एक घटना में दो ओरंगुटान का नुकसान.

 

ओरंगुटान्स पर स्मगलिंग का साया

 

ओरंगुटान की स्मगलिंग मुख्य रूप से अवैध पालतू जानवरों के बाजार में मोटी कमाई के लिए होती है. इंडोनेशिया, मलेशिया में अमीर लोग स्टेटस सिंबल के लिए ओरंगुटान के बच्चों को पालना पसंद करते हैं. एक व्यस्क ओरंगुटान की कीमत ब्लैक मार्केट में 25 से 30 लाख हो सकती है. कुछ क्षेत्रों में इनके मांस को खाया जाता है. इनके शरीर के अंगों का उपयोग पारंपरिक दवाओं या जादुई टोटकों में किया जाता है.

 

ओरंगुटान के बच्चे इतने नाजुक होते हैं कि स्मगलिंग के दौरान इन्हें ले जाते समय भूख, बीमारी और तनाव की वजह से दम तोड़ देते हैं. ये किसी इंसान की तरह अपने पारिवारिक समूह से अलग हटकर ज्यादा दिन जी नहीं सकते.

GF….

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