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राजा राजपुरुष और न्यायाधीश के लिए दंड का निर्धारण, भाग – 20 ख
मनुस्मृति के प्राविधान।अब हम मनुस्मृति की ओर आते हैं।
मनुस्मृति के अध्याय 8 में न्यायिक व्यवस्था पर चर्चा की गई है । मनु महाराज इस अध्याय में हमको बताते हैं कि यदि किसी व्यक्ति का कोई लावारिस धन कहीं प्राप्त होता है तो तीन वर्ष तक उसके आने की प्रतीक्षा करनी चाहिए, तब तक धन को सुरक्षित रखना चाहिए। उसके बाद उसे राजा राजकोष में ले ले। यदि कोई कहता है कि यह धन मेरा है तो उससे उचित विधि से पूछताछ करनी चाहिए अर्थात धन की संख्या, रंग, समय ,पहचान आदि पूछे, धन का स्वरूप, मात्रा आदि बातों को सही-सही बताकर ही दावा करने वाला स्वामी उस धन को प्राप्त करने का अधिकारी हो सकता है। ऐसे धन में से राजा छठा , दसवां अथवा बारहवां भाग कर के रूप में ग्रहण करे। शेष को जनकल्याण पर खर्च कर दे। यदि राजा के धन की चोरी होती है तो राजा ऐसे चोर को हाथी से कुचलवाकर मरवा डाले।
राजा या राजपुरुष विवादों को बढ़ाने का काम न करें। मुकदमों का फैसला करने के लिए राजा मुकदमे की सच्चाई को जानने का प्रयास करे, न्याय का उद्देश्य अपने आत्मा के अनुकूल सत्य निर्णय देना होता है। राजा साक्षी के बयानों के साथ-साथ उसकी सामाजिक स्थिति तथा मानसिक स्थिति आदि पर भी विचार करे। ऋणधारक से अपना धन वसूल करने के लिए ऋण देने वाले अर्थात धनी की ओर से प्रार्थना करने पर धनी का वह लेख आदि से सिद्ध दावा स्वीकार किया जाए जिस पर किसी प्रकार का संशय शेष न रहने पाए। ऋणधारक से तो पर्याप्त साक्ष्य लिया ही जाए, साथ ही ऋणदाता से ऋण के लेख आदि प्रमाणों को भी लिया जाए।
कौन साक्षी नहीं हो सकता
वादों में यदि कोई व्यक्ति अप्रामाणिक सिद्ध होता है तो उसके विरुद्ध भी कार्यवाही की जानी चाहिए। साक्षी बनने के नियम भी महर्षि मनु ने वर्णन मनुस्मृति में दिए हैं । स्वामी दयानंद जी कहते हैं कि ” सब वर्णों में धार्मिक विद्वान निष्कपटी सब प्रकार धर्म को जानने वाले लोभरहित सत्यवादियों को न्याय व्यवस्था में साक्षी करे। इससे विपरीत को कभी न करें जो व्यक्ति धनी से ऋण ले, आदि लेन देन का संबंध रखते हैं, उन्हें कभी साक्षी नहीं माना जा सकता। ऐसे व्यक्ति भी कभी साक्षी नहीं हो सकते जो अभियोगी के शत्रु हों । जिसकी साक्षी पहले झूठी सिद्ध हो चुकी है ,वह भी साक्षी नहीं हो सकते । अपराधी लोगों को भी साक्षी नहीं बनाया जा सकता।
बलात्कार जैसी घटनाओं में सभी साक्षी हो सकते हैं । दोनों ओर के साक्ष्य प्राप्त करके न्याय प्रदान करना चाहिए। उत्तम गुणी साक्षी के कथन पर विश्वास करना चाहिए। इससे न्याय की रक्षा होती है और राजा के यश में वृद्धि होती है। समाज और संसार में शांति व्यवस्था बनी रहती है।
न्याय और साक्ष्य के संबंध में प्राविधान
इस अध्याय में महर्षि मनु ने साक्ष्य लेने की विधि , साक्षी आत्मा के विरुद्ध साक्ष्य कभी ना दे , असत्य साक्ष्य के आधार ऋण पर ब्याज का विधान, लाभ वाली गिरवी पर कोई ब्याज नहीं, धरोहर संबंधी व्यवस्थाएं, कौन व्यक्ति किस व्यक्ति से ब्याज नहीं ले सकता, समुद्री यानों का किराया भाड़ा निर्धारण, कुटुंब के लिए धन को कुटुंबी लौटाए, जमानती संबंधी विधान, शास्त्र और नियम विरुद्ध लेन देन , अप्रमाणिक धरोहर रखने के विवादों का निर्णय कैसे हो ? दूसरे की वस्तु बेच देने पर राजा किस प्रकार न्याय करे, मिलजुल कर व्यापार करना और उसमें लाभ का बंटवारा, दान की गई वस्तु को लौटाना, वेतन देने न देने का विवाद, कृत प्रतिज्ञा से लौट जाना, खरीद बिक्री का विवाद, पशु स्वामी और ग्वालों का विवाद, सीमा संबंधी विवाद , कटु वाक्य के बोलने संबंधी विवाद और उनका निर्णय, चोरी करने का विवाद और उसका निर्णय , चोरों के निग्रह से राष्ट्र की वृद्धि, चोरों से प्रजा की रक्षा श्रेष्ठ कर्तव्य है, प्रजा की रक्षा किए बिना कर लेने वाला राजा पापी होता है, चोर की स्वयं प्रायश्चित की विधि, दोषी को दंड न देने से राजा पाप का भागी होता है, पापियों के संग में पाप , राजाओं को दोषियों को दंड प्रदान करके निर्दोषता प्राप्त होती है, विभिन्न चोरियों की दंड व्यवस्था, डाकू- चोरों के अंगों का छेदन , साहस और चोरी का लक्षण, माता-पिता आचार्य आदि सभी राजा द्वारा दंडनीय हैं, अपराध करने पर राजा को साधारण जन से सहस्र गुणा दंड होने की व्यवस्था की गई है।
राजा को मिले सहस्र गुणा दंड
महर्षि दयानंद जी महाराज ने मनुस्मृति के राजा को दंड देने के विधान पर सत्यार्थ प्रकाश के समुल्लास 6 में लिखा है कि ” जिस अपराध में साधारण मनुष्य पर एक पैसा दंड हो, उस अपराध में राजा को 1000 पैसा दंड होवे अर्थात साधारण मनुष्य से राजा को सहस्र गुणा दंड होना चाहिए। मंत्री अर्थात राजा के दीवान को 800 गुणा, उससे न्यून को 700 गुणा और उससे भी न्यून को 600 गुणा। इसी प्रकार उत्तर – उत्तर अर्थात जो एक छोटे से छोटा कर्मचारी अर्थात चपरासी है उसको 8 गुणा दंड से कम नहीं होना चाहिए। क्योंकि यदि प्रजापुरुषों से राजपुरुषों को अधिक दंड न होवे तो राजपुरुष प्रजापुरुषों का नाश कर दें । जैसे सिंह अधिक और बकरी थोड़े दंड से ही वश में आ जाती है, इसलिए राजा से लेकर छोटे से छोटे राजकर्मचारी पर्यंत राजपुरुषों को अपराध में प्रजा पुरुषों से अधिक दंड होना चाहिए।”
सारी लोकतांत्रिक व्यवस्था दोषी है
हमारे संविधान में जहां पर उच्चतम न्यायालय, राज्यों के उच्च न्यायालय और अन्य न्यायालयों की व्यवस्था की गई है, वहां पर शासन प्रशासन में बैठे लोगों के लिए अर्थात राजपुरुषों के लिए कैसा दंड होगा ? यह व्यवस्था कहीं पर भी नहीं की गई है । इसका अभिप्राय है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान के बनाने के समय ही या तो संविधान में अपने लिए चोर दरवाजे छोड़ दिए ,जिनसे भविष्य में आने वाले राजपुरुष अपराध करके भी आराम से बाहर निकल जाएं या भविष्य में राजपुरुष भी अपराध कर सकते हैं , इस ओर उनका ध्यान ही नहीं गया या फिर उन्होंने यह मान लिया कि जो राजपुरुष होंगे अर्थात शासन – प्रशासन में बैठे लोग होंगे , वे किसी और ही मिट्टी के बने होंगे ? जो कभी अपराध या पाप कर ही नहीं सकते। यदि उन्होंने ऐसा माना तो उन्हें राजा या राजतंत्र की यह कहकर आलोचना करने का कोई अधिकार न तो था और न है कि इसमें राजा को किसी दैवीय शक्ति का प्रतिनिधि माना जाता है ? यदि लोकतंत्र में भी जनप्रतिनिधियों को ‘ किसी और ही मिट्टी ‘ का बना माना जाएगा और उनसे अपेक्षा की जाएगी कि वह कभी अपराध करेंगे ही नहीं और यदि करेंगे भी तो उन्हें जनसाधारण से कम दंड दिया जाएगा या दिया ही नहीं जाएगा तो यह व्यवस्था लोकतंत्र के विरुद्ध है। इस प्रकार की व्यवस्था आज की सारी लोकतांत्रिक मशीनरी को दोषी सिद्ध करती है।
शूद्र के लिए दंड की व्यवस्था अति न्यून
जो लोग यह मानते हैं कि मनु महाराज ने उच्च वर्ण के लोगों के साथ अपनी सहानुभूति रखते हुए अर्थात उनके प्रति विशेष आशीर्वाद का भाव रखते हुए उन्हें कुछ विशेष सुविधाएं प्रदान की हैं और शूद्रों के प्रति कठोरता का व्यवहार करते हुए उन्हें अनावश्यक ही दण्डित करने का विधान किया है ? – उन्हें मनुस्मृति के आठवें अध्याय को ही पढ़ना चाहिए। जहां पर यह स्पष्ट व्यवस्था की गई है कि उच्च वर्ण के व्यक्तियों को साधारण जनों से अधिक दंड देना चाहिए। मनु महाराज ( ‘ विशुद्ध मनुस्मृति’ के अनुसार 205 – 206 श्लोक संख्या ) में स्पष्ट रूप से कहते हैं कि चोरी आदि अपराधों में यदि किसी विवेकी शूद्र को साधारण जन के एक पैसे के दंड की तुलना में 8 गुणा अर्थात 8 पैसे दंड दिया जाता है तो उसी अपराध में वैश्य को 16 गुणा अर्थात शूद्र से दो गुणा 16 पैसे दंड दिया जाए और उसी अपराध में क्षत्रिय को 32 गुणा अर्थात शूद्र से चार गुणा और वैश्य से 2 गुणा अधिक दंड दिया जाए तथा उसी अपराध में ब्राह्मण को 64 गुणा अर्थात शूद्र से 8 गुना अधिक वैश्य से चार गुणा अधिक और क्षत्रिय से दो गुणा अधिक दंड दिया जाए अथवा पूरा 100 गुणा अधिक दंड दें अथवा 64 का भी दोगुणा अर्थात 128 गुणा तक अधिक दंड दे। क्योंकि ब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति किए जाने वाले उस अपराध के दोषों और जनता पर पड़ने वाले उसके दुष्प्रभाव को भली भांति तथा अन्य वर्णों से अधिक जानता है। क्योंकि वह विद्वान और समाज में सर्वोच्च प्रतिष्ठा पाता है। अतः जो जितना ज्ञानी होकर अपराध करता है, वह उतना ही अधिक दंड का पात्र है।”
आज चोर के साथ पुलिसकर्मी ही मिले होते हैं
यदि अपराध , अपराधी और दंड को लेकर वर्तमान परिस्थितियों के दृष्टिगत चिंतन किया जाए तो पता चलता है कि आज की स्थिति यह है कि पुलिसकर्मी और कभी-कभी नेता अथवा उद्योगपति मिलकर किसी असहाय और दुर्बल व्यक्ति को कानून के शिकंजे में फंसा देते हैं और अपने आप बाहर निकल जाते हैं। कई बार न्यायाधीश को भी यह जानकारी होती है कि वास्तविक अपराधी कौन है और वह दंड किसको दे रहा है ? परंतु वह भी बिक जाता है। इससे न्याय , न्यायालय और न्याय प्रणाली के प्रति लोगों में विश्वास भंग होने की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है। न्याय, न्यायालय और न्याय प्रणाली के प्रति आस्था तभी जीवित रह सकती है, जब महर्षि मनु की उपरोक्त दण्ड-व्यवस्था को लागू किया जाए। इस प्रकार की व्यवस्था का स्पष्ट उल्लेख हमारे संविधान में होना चाहिए।
‘ मनुस्मृति ‘ के आधार पर स्वामी दयानंद जी ‘ सत्यार्थ प्रकाश’ के समुल्लास 6 में लिखते हैं कि ” राज्य के अधिकारी और ऐश्वर्य की इच्छा करने वाला राजा बलात्कार काम करने वाले डाकुओं को दंड देने में एक क्षण भी देर ना करें।”
….तो राजा विनाश को प्राप्त हो जाता है
महर्षि मनु कहते हैं कि डाकू को दंड न देने वाला राजा विनाश को प्राप्त होता है। अध्याय 8 में ही महर्षि मनु स्पष्ट करते हैं कि आततायी -आतंकवादी को मारने में राजा को कोई अपराध या पाप नहीं लगता, उसे जैसे चाहे राजा नष्ट कर सकता है। महर्षि मनु इसी अध्याय में यह भी बताते हैं कि जिस राजा के राज्य में कोई चोर न हो, कोई परस्त्रीगामी न हो, दुष्ट वाणी बोलने वाला न हो, अत्याचारी और दंड प्रहार करके घायल करने वाला न हो, वह राजा स्वर्ग के राजा इंद्र के समान सुखी और सर्वश्रेष्ठ राजा कहलाता है।
इसी अध्याय में माता-पिता, स्त्री पुत्र को छोड़ने पर भी दंड की व्यवस्था की गई है। व्यापार में शुल्क और वस्तुओं के भावों का निर्धारण करने की व्यवस्था भी दी गई है।
महर्षि मनु ने मनुस्मृति के नौवें अध्याय में स्त्री पुरुष धर्म संबंधी विवाद और उसके निर्णय संबंधी प्रावविधान किए हैं। स्त्री के प्रति कर्तव्य पालन न करने वाले पिता, पति, पुत्र सभी निंदा के पात्र बताए हैं। यह व्यवस्था भी मनु महाराज का स्त्री के प्रति विशेष आदर का भाव प्रकट करती है। मनु की ‘ मनुस्मृति ‘ के कई आलोचक पिता, पति, पुत्र के आधीन नारी को देखकर उसकी स्वतंत्रता पर इसे एक प्रतिबंध के रूप में देखते हैं। परंतु यहां पर स्पष्ट किया गया है कि जो पिता, पति और पुत्र नारी का उचित सम्मान कर सके और उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति न कर सके- वह निन्दा के पात्र हैं।
नारी का सम्मान सर्वोपरि
क्योंकि स्त्री पर ही परिवार की प्रतिष्ठा निर्भर है। स्पष्ट किया गया है कि छोटे से कुसंग से भी स्त्रियों की रक्षा अवश्य की जानी चाहिए। महर्षि मनु के लिए नारी का सम्मान सर्वोपरि है। इसी को वह एक व्यवस्था के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। इसी अध्याय में महर्षि मनु ने जाया के लक्षणों की भी चर्चा की है। यह भी स्पष्ट किया गया है कि स्त्रियां आत्म नियंत्रण से ही बुराइयों से बच सकती हैं।
आज आत्म नियंत्रण खोकर नारी पर्दे पर आकर जब यह कहती है कि “मेरा शरीर मैं जो चाहूं सो करवा सकती हूं “- तो बहुत लज्जा की अनुभूति होती है। यह तो माना जा सकता है कि शरीर उसका है , परंतु इस शरीर के साथ उसकी मर्यादाओं का भी कोई तकाजा है । उसे आत्म नियंत्रण रखकर मर्यादाओं की स्थापना भी करनी है। क्योंकि मनु महाराज स्त्रियों को घर की लक्ष्मी बताते हैं और लक्ष्मियों को लक्ष्मी के अनुरूप ही रहना चाहिए। घर का सुख स्त्री पर निर्भर करता है, इसलिए स्त्री को घर के परिवेश को सुखप्रद बनाना चाहिए।
मनु महाराज ने यह भी स्पष्ट किया है कि पति-पत्नी दोनों को ही मर्यादाओं का पालन करना चाहिए। दोनों का ही एक दूसरे के प्रति शिष्ट और मर्यादित आचरण होना चाहिए।
नवम अध्याय में ही महर्षि मनु ने रिश्वत लेकर अन्याय करने वालों को दंड देने का विधान किया है। निर्णय में कपट करने वालों को भी दंड देने की बात कही गई है । अमात्यों और न्यायाधीशों को अन्याय करने पर दंड देने की भी व्यवस्था मनु करते हैं। जबकि भारत के वर्तमान संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई है। यदि मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग लाने की बात कही भी गई है तो वह बहुत जटिल प्रक्रिया है।
इसी प्रकार की अनेक व्यवस्थाओं को देखने , पढ़ने और समझने से स्पष्ट होता है कि महर्षि मनु का राजचिंतन और राजधर्म संबंधी व्यवस्थाएं आज के संविधान की अपेक्षा कहीं अधिक विस्तृत हैं।
(डॉ राकेश कुमार आर्य)४
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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