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किसी समय समाजवादी पार्टी में तीन प्रमुख मुसलमान चेहरे हुआ करते थे। आज़म खान, मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद।
आज़म खान तो समाजवादी पार्टी के फाउंडिंग मेंबर भी हैं। उनको छोड़ दिया जाय तो बाकी दोनों एक-आध बार दूसरे दलों में भी गए लेकिन फिर भी अधिकतम समय सपा के ही सदस्य रहे।
उत्तर प्रदेश में सपा के एम वाई समीकरण में एम के सबसे बड़े प्रतिनिधि ये तीनों ही थे।
सपा कई बार इनके दम पर मुसलमानों के वोट पाकर सत्ता में भी आई।
लेकिन जब २०१४ में नरेंद्र मोदी की सत्ता आई तो धीरे-धीरे ऐसे राजनैतिक चक्रव्यूह रचे गए कि भाजपा को छोड़कर सभी पार्टियां प्रोमुस्लिम पार्टियों जैसा व्यवहार करने लगीं।
इससे हिंदू वोट गोलबंद हुआ और भाजपा को पूरे देश में आशातीत सफलता मिली और यह मान्यता ध्वस्त हुई कि मुस्लिमों का समर्थन सत्ता प्राप्ति करने का सबसे अनिवार्य तत्व है।
यूँ कहें तो भाजपा ने विपक्ष के सबसे मजबूत वोटबैंक को बिल्कुल अप्रासंगिक कर दिया।
इधर उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव को भी धीरे- धीरे यह एहसास होने लगा कि मुस्लिम रूपी उनकी सबसे बड़ी ताकत अब सबसे बड़ी दुर्बलता बनती जा रही है।
फिर वे इनसे मुक्ति पाने के लिए छटपटाने लगे। दूसरे आज़म खान रोज लुगाई की तरह मुँह फुलाकर कोप भवन में चले जाते और अखिलेश भैया को हेलिकॉप्टर से लखनऊ छोड़कर रामपुर आना पड़ता और मनाना पड़ता।
मजबूरी यह थी कि सीधे- सीधे कुछ कह भी नहीं सकते थे।
उसके बाद उत्तर प्रदेश में निजाम बदला और योगी जी मुख्यमंत्री बन गए। उनकी सबसे प्रमुख ताकत ही प्रखर हिंदुत्व थी। साथ ही वे किसी जमाने में इन मुस्लिम नेताओं द्वारा सताये भी गए थे। वे इनका कानूनी रूप से सफ़ाया करने के बारे में सोचने लगे।
फिर एक दिन योगी जी से मिलने मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव पहुँचे।
उनके मिलने का उद्देश्य ही यही था कि इन मुसलमान नेताओं से किनारा किया जाय। मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव इनकी ब्लैकमेलिंग से बहुत परेशान थे। उन्होंने योगी जी से साफ-साफ कहा कि आप इनके साथ कुछ भी कीजिये, हम थोड़ा- बहुत हल्ला करके चुप हो जायेंगे। हमे अपनी प्रोमुस्लिम छवि से मुक्ति पानी है।
फिर जो-जो हुआ, किसी को बताने की जरूरत नहीं है।
सपा की इसी चुप्पी से खुश होकर मोदी जी ने मुलायम सिंह यादव को पद्म विभूषण भी दिलवा दिया।
इसके बाद अखिलेश यादव ने पी डी ए बनाया, जिसमे पहले तो ए को पी और डी के बाद रखा गया और वह भी ‘ए’ था, कोई एम नहीं।
यानि राजनैतिक रूप से भी खुद अखिलेश ने मुसलमानों को एक साजिश के तहत किनारे लगा दिया।
उसके बाद उन्हें चुल्ल मची धार्मिक हिंदू बनने की और अब वे अयोध्या, काशी के चक्कर काट रहे है, शंकराचार्य के चरणों में लोट रहे हैं।
इससे सिद्ध होता है कि वर्तमान समय में मुसलमानों का सबसे बड़ा शत्रु अगर कोई है तो अखिलेश यादव ही हैं।
इसलिए आगामी विधान सभा चुनावों में मुसलमानों को अखिलेश को जरूर मजा चखाना चाहिए। वे बेशक ओवैसी की पार्टी को वोट दे दें, बसपा को वोट दे दें, यहाँ तक कि भाजपा को वोट दे दें, लेकिन सपा को वोट न दें।
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