कूची का कटाक्ष: जब कार्टूनों से थर्राती थी सत्ता

कूची का कटाक्ष: जब कार्टूनों से थर्राती थी सत्ता

​छठे, सातवें और आठवें दशक (1960 से 1980 के दशक) में जब सामाजिक मीडिया का नामोनिशान नहीं था और दूरदर्शन की पहुँच सीमित थी, तब समाचार पत्रों का पहला पन्ना और पत्रिकाओं के पन्ने राजनीतिक व सामाजिक चेतना के सबसे बड़े केंद्र थे। उस दौर में व्यंग्यचित्र (कार्टून) केवल एक रेखाचित्र नहीं था, बल्कि वह बिना एक शब्द कहे सत्ता के सिंहासन को हिला देने वाली सबसे शक्तिशाली आवाज़ था। व्यंग्यचित्र के बिना समाचार पत्र अधूरा माना जाता था—यह केवल सूचना नहीं देता था, बल्कि पाठक के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान लाते हुए उसे सोचने पर मजबूर कर देता था।

​समाचार पत्रों का कलेवर और व्यंग्यचित्र का सौंदर्य

​उस युग में समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के प्रथम पृष्ठ या भीतरी पन्नों पर व्यंग्यचित्र की मौजूदगी उनकी जीवंतता की गारंटी होती थी। श्यामल-श्वेत (ब्लैक एंड व्हाइट) छपाई के ज़माने में, जब पन्नों पर गद्यात्मक लेखों और समाचारों का भारी जमावड़ा होता था, तब एक व्यंग्यचित्र पूरे पन्ने को सौंदर्य, राहत और स्पष्टता प्रदान करता था।

​प्रथम पृष्ठ का महत्व: मुख्य पृष्ठ पर छपा लघु व्यंग्यचित्र दिन की सबसे बड़ी ख़बर पर मारक और तीखी टिप्पणी होता था।

​भीतरी पेजों और संपादकीय पन्ने का आकर्षण: भीतरी पन्नों पर विस्तृत संपादकीय व्यंग्यचित्र राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मुद्दों का विश्लेषणात्मक और मनोरंजक निचोड़ पेश करते थे।

​साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग और लोकप्रिय चित्रात्मक कोना

​केवल दैनिक समाचार पत्र ही नहीं, बल्कि उस दौर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ने भी व्यंग्यचित्र संस्कृति को नए आयाम दिए:

​धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान: इन हिंदी पत्रिकाओं ने साहित्य और कला के साथ-साथ व्यंग्यचित्रों को प्रमुखता से छापा। आबिद सुरती का सिर पर साफा बांधे और बिना दांतों की मुस्कान वाला ‘ढब्बूजी’ का चरित्र घर-घर में लोकप्रिय था।

​चित्रकथाएं और मनोरंजक धारावाहिक: इसी दौर में दैनिक व साप्ताहिक पत्रों में ‘मॉडेस्टी ब्लेज़’ जैसी जासूसी और साहसिक कारनामों से भरपूर विदेशी चित्रकथाओं ने युवाओं और वयस्कों के बीच एक अलग रोमांच पैदा किया।

​देश, प्रदेश और इंदौर का व्यंग्यचित्र परिदृश्य

​राष्ट्रीय स्तर से लेकर क्षेत्रीय स्तर तक, व्यंग्यचित्रकारों ने जनमानस की आवाज़ को बखूबी उकेरा:

​देश स्तर पर: आर.के. लक्ष्मण का ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में ‘आपने कहा’ (यू सेड इट) और उनका अमर चरित्र ‘आम आदमी’ (कॉमन मैन) भारतीय लोकतंत्र की पहचान बन गया। लक्ष्मण की लेखनी से इंदिरा गांधी की तीखी नाक और उनके व्यक्तित्व का उभार इतना सटीक होता था कि राजनीतिज्ञ भी उनके मुरीद थे। वहीं के. शंकर पिल्लई, अबू अब्राहम, ओ.वी. विजयन, और रंगा जैसे दिग्गजों ने व्यंग्यचित्र कला को राष्ट्रीय राजनीति का मुख्य आधार बनाया।

 

​मध्य प्रदेश और इंदौर का योगदान: इंदौर और मध्य प्रदेश के पत्रकारिता परिदृश्य में भी व्यंग्यचित्रों का विशेष दबदबा रहा। इंदौर के प्रमुख दैनिकों (जैसे इंदौर समाचार, जागरण, नवभारत व अन्य बड़े दैनिकों) में स्थानीय और प्रदेश की राजनीति पर तीखे व्यंग्यचित्र छपते थे। मालवीयजी और अन्य आंचलिक व्यंग्यचित्रकारों ने स्थानीय बोलचाल, मालवी संस्कृति और आम जनजीवन के मुद्दों को अपनी तूलिका से जीवंत किया।

​मशहूर राजनीतिक चेहरे और ऐतिहासिक घटनाएं

​1960 से 1980 के दशकों के दौरान कई ऐसे राजनीतिक चेहरे थे, जिनकी शारीरिक बनावट और हाव-भाव व्यंग्यचित्रकारों के लिए वरदान साबित होते थे:

 

​मशहूर राजनीतिक चेहरे: इंदिरा गांधी का दबदबा और उनका रूप-रंग, जार्ज फर्नांडिस के बिखरे बाल और खादी का कुर्ता, लालू प्रसाद यादव की लटें और बोलने का अंदाज, मुलायम सिंह यादव, पी.वी. नरसिंह राव की गंभीर मुद्रा, बाल ठाकरे का आक्रामक अंदाज, एन.टी. रामाराव का करिश्माई स्वरूप, और जयललिता।

​कला और संस्कृति के चेहरे: मशहूर चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन के नंगे पांव और हाथ में लंबी तूलिका (ब्रश) थामे व्यंग्यचित्र अक्सर सुर्खियों में रहते थे।

 

​ऐतिहासिक घटनाएं: 1975 के आपातकाल के दौरान व्यंग्यचित्रकारों पर कड़ी सेंसरशिप लगी, लेकिन उन्होंने सांकेतिक व्यंग्यचित्रों से प्रतिरोधी स्वर जारी रखा। इसके बाद 1980 के दशक के अंत में ‘बोफोर्स तोप’ घोटाला व्यंग्यचित्रकारों का सबसे पसंदीदा विषय बना। राजीव गांधी, बोफोर्स तोप और भ्रष्टाचार पर बने व्यंग्यचित्रों ने पूरे देश का राजनीतिक माहौल बदल दिया था।

​व्यंग्यचित्र केवल एक कलाकृति नहीं, बल्कि उस दौर का एक इतिहासकार था। इसने भारतीय लोकतंत्र को बेबाक, संवेदनशील और सहिष्णु बनाए रखने में एक अविस्मरणीय भूमिका निभाई।

​- मदन वर्मा “माणिक” इंदौर, मध्यप्रदेश

About admin

Check Also

*सोचा न था*

Jdnews Vision….. *सोचा न था*   आप चले जाएंगे छोड़कर सोचा न था, फिर देखेंगे …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *