व्यंग्यबाण-…. …शकर की मिठास और हमारी कड़वी जीभ…

Jdnews Vision…

व्यंग्यबाण-….

शकर की मिठास और हमारी कड़वी जीभ…..

​राखी का त्योहार आ गया है, लेकिन बाजार की मिठास जरा हटके है। शकर चालीस से सीधे सत्तर रुपये किलो पहुँच गई है। जो लोग कहते थे कि “मीठा कम खाने से डायबिटीज नहीं होती”, उन्हें प्रशासन ने एक नया और नायाब तोहफा दिया है—’दाम बढ़ाओ, देश का स्वास्थ्य सुधारो’। अब गरीब और मध्यम वर्ग के लोग राखी पर मिठाई खाने के बजाय केवल शकर का भाव सुनकर ही अपना खून सुखा रहे हैं।

​कमाल की बात यह है कि गोदामों में शकर के बोरे छत छू रहे हैं। कोई कमी नहीं है, बस ‘किल्लत’ का एक शानदार नाटक खेला जा रहा है। हमारे मुनाफाखोर इतने बड़े कलाकार हैं कि भरी गोदामों के बीच खड़े होकर ऐसा रोना रोते हैं कि आँखों से आँसू नहीं, सीधे मुनाफा टपकता है। और हमारा प्रशासन? वह तो ‘सफाई’ देने का इतना शौकीन है कि जितनी सफाई वे अपनी नाकामी छुपाने में देते हैं, उतनी अगर बाजार में दे दें तो कालाबाजारी का नामो-निशान न रहे।

 

​महंगाई का यह घोड़ा बिना लगाम के ऐसा दौड़ रहा है मानो इसे ओलंपिक का गोल्ड मेडल जीतना हो। बेचारी बहनें सोच रही हैं कि भाई की कलाई पर राखी बाँधने के बाद उसका मुँह शकर से मीठा कराएँ या अपनी जेब का गम मनाएँ। त्यौहार तो हर साल आते हैं, लेकिन हर त्यौहार पर आम आदमी की जेब को छीलने का यह सरकारी और व्यापारी संयुक्त उपक्रम हमेशा सुपरहिट रहता है।

​अगर यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब शादियों और त्यौहारों में सोने-चाँदी की तरह शकर के दाने भी तिजोरी में बंद करके रखे जाएँगे। प्रशासन से कागजी बयानों की चाशनी घोलना बंद करे। अगर हिम्मत है तो मुनाफाखोरों की अक्ल पर पड़ी कड़वाहट का इलाज करे, वरना त्यौहार की मिठास तो कब की लुट चुकी, अब बस आम इंसान के मुँह का स्वाद बिगड़ना बाकी है।

– मदन वर्मा “माणिक” इंदौर, मध्यप्रदेश

About admin

Check Also

*सोचा न था*

Jdnews Vision….. *सोचा न था*   आप चले जाएंगे छोड़कर सोचा न था, फिर देखेंगे …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *