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मणिपुर के राहत शिविरों में हो रही मौतों और यौन उत्पीड़न के गंभीर मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की जमकर क्लास लगाई है। देश की सर्वोच्च अदालत ने शिविरों में हुई संदिग्ध मौतों पर गहरी चिंता जताते हुए मणिपुर के मुख्य सचिव को सभी मामलों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट अदालत में पेश करने का सख्त निर्देश दिया है।
मुख्य सचिव को कड़ी चेतावनी
सुनवाई के दौरान, जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए पीठ ने शिविरों में रह रहे विस्थापितों की सुरक्षा और सम्मान पर गंभीर सवाल खड़े किए। राज्य सरकार की ओर से जानकारी देने में बरती गई ढिलाई और हीलाहवाली पर भारी नाराजगी जताते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने दो टूक शब्दों में कहा, “अपने मुख्य सचिव से कहें कि वह अदालत को सख्त आदेश पारित करने के लिए मजबूर न करें। हमें बताएं कि अब तक क्या कदम उठाए गए हैं?”
मुआवजे की रकम और पोस्टमार्टम पर उठाए सवाल
अदालत को यह जानकारी दी गई कि मणिपुर के आठ जिलों के राहत शिविरों में कुल 640 मौतें दर्ज की गई हैं, जिनमें से केवल 20 मामलों में ही पोस्टमार्टम कराया गया था। इस खुलासे के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में केवल 20 से 30 हजार रुपये का मामूली मुआवजा देने पर भी मणिपुर सरकार से कड़ा जवाब तलब किया
8 जिलों में 42 एसआईटी का गठन और जांच का हाल….
मामले की सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि हिंसा से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच के लिए 8 जिलों में कुल 42 एसआईटी (SIT) का गठन किया गया है। वर्तमान में 3,020 मामलों की जांच जारी है, जिनमें से 302 मामलों में चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, जबकि 1583 मामलों में क्लोजर रिपोर्ट सौंपी गई है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मणिपुर राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (MSLSA) को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि इन प्राथमिकियों पर त्वरित जांच हो और राहत शिविरों में रहने वाले आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों (IDPs) की सुरक्षा व गरिमा बनी रहे। न्यायमूर्ति मित्तल समिति और एक आईएएस अधिकारी की रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद पीठ ने ये सख्त आदेश दिए। इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि मणिपुर के राहत शिविरों में 30 से अधिक मौतें हुईं, जिनमें से एक कथित मामला यौन उत्पीड़न के बाद का भी था।
इसके साथ ही, पीठ ने यह भी उम्मीद जताई कि मणिपुर में साल 2023 की जातीय हिंसा से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए बनाई गईं विशेष निचली अदालतें जल्द ही अपनी सुनवाई पूरी करेंगी, जिनकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) के जिम्मे है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामलों का पूरा विवरण विधिक सेवा अधिवक्ताओं को उपलब्ध करा दिया गया है, ताकि पीड़ित याचिकाकर्ता अपने मामलों को मजबूती से आगे बढ़ा सकें।
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