गीत
हे पितृदेव! तुमको प्रणाम,
तुम ही हो मेरे चारों धाम।
तुम ही बृह्मा, तुम ही विष्णु,
तुम ही देवों में हो महान।।
तुम त्याग समर्पण के द्वारा,
देते संतान को सुख जहान।
आदर्श मार्गदर्शक बनकर,
दिखाते मग सूरज समान।।
अनुशासन प्रेम सिखाते हो,
गुरु प्रथम का दर्जा पाते हो।
संतान की इच्छा करो पूर्ण,
तुम्हीं हो सच्चे सुख निधान।।
परिवार का हीरो होते हो,
मोती सम उसे पिरोते हो।
होते तुम्हीं सभी की ढाल,
सदकर्मों में हो बेमिशाल।।
तुम्हीं तो जीतना सिखलाते,
प्रेरणा और प्यार को दर्शाते।
तव दुआ सदा देती है काम,
तुम नहीं कोई आदमी आम।।
तुम ही तो धर्म हमारे हो,
तुम ही तो स्वर्ग हमारे हो।
वर्षा सर्दी चाहे रहती घाम,
तुम्हीं सब दर्दों की हो बाम।।
डॉ. विश्वम्भर दयाल अवस्थी
‘ विद्या – सागर ‘
खुर्जा, बुलंदशहर ( उ. प्र.)
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