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व्यंग्य बनाम तंज-
भ्रष्टाचार का ‘कीचड़’ और विस्मित आम आदमी…!
वर्षा जनित राहों की कठिनाइयां इतनी विस्मित करने वाली हैं कि एक आम आदमी दार्शनिक बन जाता है। ऑफिस जाने वाला बाबू जब पैंट को घुटनों तक समेटकर, जूते हाथ में लेकर सड़क पार करता है, तो वह किसी ‘कठिन तपस्या’ में लीन ऋषि जैसा प्रतीत होता है।
हर साल गड्ढे भरने के नाम पर ‘पैच वर्क’ का खेल खेला जाता है। यह पैच वर्क ठीक वैसा ही है जैसे फटे हुए कुर्ते पर सोने का पैच लगा दिया जाए। पहली ही बारिश इस पैच वर्क को बहा ले जाती है और पीछे छोड़ जाती है—भ्रष्टाचार का नग्न सच।
विस्मय तो इस बात का है कि हर साल वही वादे, वही दावे और वही नाले साफ न होने की कहानियां दोहराई जाती हैं। जनता टैक्स देती है ताकि उसे सड़कें मिलें, लेकिन तंत्र उसे ‘वॉटर पार्क’ का मुफ़्त पास थमा देता है। पुलों के ढहने और सड़कों के धंसने पर जब जांच बैठती है, तो पता चलता है कि कसूरवार कोई इंसान नहीं, बल्कि वह ‘पानी’ था जो बेवजह ऊपर से बरस गया।
– मदन वर्मा “माणिक”
इंदौर, मध्यप्रदेश
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