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मां काली सगुणा भी है निर्गुणा भी है – स्वामी मुक्तिनाथानंद

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लखनऊ : :…

उपासना का अंतिम आधार एक ही दिव्य सत्ता है – स्वामी जी…

 

*सोमवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि* श्रीरामकृष्ण परमहंस का आध्यात्मिक जीवन केवल उपदेशों और शास्त्रीय विचारों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह प्रत्यक्ष अनुभूति, भक्ति, संगीत और साधना से गहराई से जुड़ा हुआ था। उनके जीवन और शिक्षाओं में भक्ति-गीतों का विशेष स्थान था। गीत उनके लिए केवल मनोरंजन या कला का माध्यम नहीं थे, बल्कि ईश्वर के प्रति प्रेम और आत्मिक जागरण की एक प्रभावशाली साधना थे।

*स्वामी जी ने बताया कि इस संदर्भ में गिरिशचंद्र घोष द्वारा रचित गीतों का विशेष उल्लेख मिलता है*। इन गीतों में केवल भावनात्मक भक्ति ही नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक सत्य भी अभिव्यक्त होते हैं। संगीत मनुष्य के शरीर और मन को एक वाद्ययंत्र की तरह माना जा सकता है। जिस प्रकार किसी वाद्ययंत्र को मधुर संगीत उत्पन्न करने के लिए ठीक प्रकार से सुर में साधना पड़ती है, उसी प्रकार मनुष्य के मन को भी भक्ति, साधना और आत्मसंयम द्वारा ‘सुर में’ लाना आवश्यक है। जब मन निर्मल और एकाग्र होता है, तब भीतर स्थित आनंद और दिव्यता का अनुभव संभव होता है। *श्रीरामकृष्ण की साधना में माँ काली का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण था।* ‘दीन तारिणी’ जैसे भक्तिगीतों में माँ काली को सगुण और निर्गुण—दोनों रूपों में देखा गया है। वह एक ओर गुणों और रूप से युक्त दिव्य माता हैं, तो दूसरी ओर उस निराकार परम सत्य का भी प्रतीक हैं, जो सभी नाम और रूपों से परे है। *माँ काली को तीनों गुणों—सत्त्व, रजस् और तमस्—की अधिष्ठात्री तथा समस्त सृष्टि की रचना, पालन और लय की शक्ति के रूप में देखा जाता है।*

स्वामी जी ने समझाया कि यहाँ श्रीरामकृष्ण की एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक शिक्षा सामने आती है— *ब्रह्म और शक्ति में कोई वास्तविक भेद नहीं है। ब्रह्म परम सत्य है और शक्ति उसी सत्य की गतिशील अभिव्यक्ति*। इसे समझाने के लिए साँप का उदाहरण दिया जाता है: *साँप चाहे कुंडली मारकर स्थिर हो या गति कर रहा हो, वह साँप ही रहता है*। इसी प्रकार परम दिव्यता अपने निराकार स्वरूप में ब्रह्म और सक्रिय स्वरूप में शक्ति के रूप में अनुभव की जा सकती है। नाम और रूप अलग दिखाई दे सकते हैं, लेकिन उनके पीछे स्थित सत्य एक ही है।

 

*स्वामी जी ने बताया यही दृष्टि आगे सर्वधर्म-समन्वय की भावना तक पहुँचती है।* श्रीरामकृष्ण के अनुसार मनुष्य जिस नाम, रूप या मार्ग से ईश्वर की उपासना करे, लक्ष्य उसी एक परम सत्य की ओर है। कोई माँ श्यामा की आराधना करता है या भगवान श्याम की, बाहरी रूप भिन्न हो सकता है, लेकिन उपासना का अंतिम आधार एक ही दिव्य सत्ता है। मनुष्य की सीमित दृष्टि ही विभिन्नताओं को अलग-अलग रूप में देखती है।

 

*निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि* इस प्रकार संगीत, भक्ति और आध्यात्मिक अनुभूति के माध्यम से श्रीरामकृष्ण परमहंस का संदेश अत्यंत व्यापक बन जाता है। ईश्वर एक है, उसके अनुभव के मार्ग अनेक हैं। भक्ति मन को शुद्ध और ‘सुरबद्ध’ करती है तथा उसी के माध्यम से मनुष्य बाहरी भेदों से ऊपर उठकर उस एकत्व का अनुभव कर सकता है, जो समस्त सृष्टि के मूल में विद्यमान है।

*स्वामी मुक्तिनाथानंद*

अध्यक्ष

*रामकृष्ण मठ लखनऊ*

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