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राष्ट्र प्रमुख के लिए गाली देना कितना उचित ?….
वैदिक राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति के लिए गाली या अभद्र भाषा का प्रयोग करना सर्वथा वर्जित है । हमारे यहां पर वाणी की पवित्रता और सात्विकता पर विशेष ध्यान दिया गया है। प्रत्येक स्थिति में लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वह मधुर और सत्य वचनों का प्रयोग करेंगे। समाज के लोगों के लिए देश के नागरिक अशालीन और अभद्र भाषा का प्रयोग किसी भी स्थिति में नहीं करेंगे।
भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश करते हुए यह स्पष्ट किया है कि तुम्हारी प्रजा में किसी को भी यह अनुमति नहीं होगी कि वह राष्ट्र प्रमुख को अपशब्दों या अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए संबोधित करे। राजा के नीति विरुद्ध कार्यों की आलोचना हो सकती है परन्तु उसके लिए भाषा की मर्यादा आवश्यक मानी गई है।
अभद्रता को सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध माना गया है। हमारे यहां पर राजपद को ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में देखे जाने की परंपरा रही है। इसका कारण यह नहीं है कि उसका अनावश्यक महिमामंडन किया जाए या राजा अपने आप को ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर घमंड से फूल जाए । उसे ईश्वर का प्रतिनिधि माने जाने का अर्थ है कि वह अत्यंत विनम्र और दयालु होगा । अहंकार शून्य होगा । जैसे परमपिता परमेश्वर सभी का ध्यान रखते हैं और सभी पर अपनी दया और कृपा बरसाते हैं, वैसे ही राजा भी अहंकारशून्य होकर सब पर अपनी दया और कृपा करेगा। ऐसे मर्यादाशील राजा के प्रति आलोचना के अधिकार बहुत सीमित हो जाते हैं। उसे गाली देने या उसके प्रति अभद्रता की भाषा का प्रयोग करने का तो प्रश्न ही नहीं होता।
माना जा सकता है कि आज के समय में मर्यादा पुरुषोत्तम राजाओं का चलन नहीं है। आज देश, काल और परिस्थिति बहुत कुछ परिवर्तित हो चुके हैं। परंतु इसका अभिप्राय यह भी नहीं है कि आप बीते हुए कल की अच्छी बातों को आज लेने से इनकार ही कर देंगे। ‘ जैन जी ‘ को जिस प्रकार अपने ही देश के विरुद्ध बरगलाया जा रहा है और उसे बताया जा रहा है कि बीते हुए कल से आज को कुछ भी नहीं लेना है , यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। पर्दे के पीछे से आज लोग सत्ता स्वार्थ में देश की युवा पीढ़ी को बिगाड़ने का काम कर रहे हैं। यह आवश्यक नहीं कि यह पीढ़ी उनके साथ भी अधिक देर तक खड़ी रहेगी, पीछे से नई पीढ़ी आएगी और इसी पीढ़ी का अनुकरण करते हुए वह उनके विरोध में सड़कों पर आकर हिंसक हो जाएगी। तब देश में अराजकता के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा ? राजनीति को राष्ट्र नीति में परिवर्तित कर संभाल कर चलने की आवश्यकता है। आप वर्तमान सरकार के विरुद्ध मर्यादाओं में रहते हुए उसके कार्यों की नीतिगत आलोचना कर सकते हैं, परन्तु उसको गाली गलौज नहीं दे सकते। भारत के इतिहास में यदि विदुर जी और चाणक्य जैसे महामंत्रियों को देखा जाए तो पता चलता है कि वह अपने राजा को बड़े स्पष्ट और कठोर शब्दों में भी परामर्श ( लताड़) देने का साहस रखते थे। आज उसी प्रकार के साहस को दिखाने वाले मंत्रियों की कमी है और यह कमी ऐसा नहीं है कि मोदी जी के शासन काल में ही आरंभ हुई है, आजादी के बाद पहले दिन से ही इस कमी को अनुभव किया जाने लगा था। आज जिस प्रकार जंतर मंतर पर मर्यादाहीन भाषा का प्रयोग किया गया है ,गाली गलौज को अपनाया गया है, उसके दृष्टिगत यदि सोशल मीडिया पर आने वाली पोस्टों को देखा जाए तो वहां पर भी लोग मोदी समर्थक या विपक्ष समर्थक के रूप में बंटे हुए दिखाई देते हैं और एक दूसरे के नेताओं को बहुत ही अशोभनीय और अभद्र भाषा का प्रयोग करते देखे जाते हैं । जिसे देखकर लगता है कि सारा देश ही गाली गलौज करने वालों का देश बन कर रह गया है। इस प्रकार की भाषा को देखकर सारे विश्व में भारत की साख धूमिल हुई है।
यदि हम विदेशों के कानून की समीक्षा करें तो पता चलता है कि वहां पर अपने राष्ट्र प्रमुख की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाने वाली किसी भी आपत्तिजनक टिप्पणी को कानूनी अपराध माना जाता है। सऊदी अरब में स्पष्ट कानूनी व्यवस्था है कि किसी भी राष्ट्र प्रमुख के विरुद्ध प्रयोग किए गए आपत्तिजनक शब्दों को सार्वजनिक व्यवस्था को भंग करने या आतंकवाद की स्थिति उत्पन्न करने की श्रेणी में सम्मिलित किया जाता है। इसका कारण साफ है कि कोई भी राष्ट्र प्रमुख संपूर्ण देश का प्रतिनिधि होता है, उसको अपमानित करना या उसे गाली देना राष्ट्र के नागरिकों के जनादेश को अर्थात देश की जनता जनार्दन को अपमानित करना होता है। सऊदी अरब में ऐसे व्यक्ति को कठोर कारावास की सजा, भारी भरकम आर्थिक दंड और यदि ऐसा आरोपी कोई विदेशी नागरिक है तो उसे तुरंत देश से बाहर निकालने का कठोर नियम लागू है।
चीन में और भी अधिक कठोर नियम बनाए गए हैं। यदि वहां पर कोई भी व्यक्ति अपने राष्ट्र प्रमुख का अपमान करता है तो उसके लिए व्यवस्था है कि पुलिस तुरंत ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है। कानूनी प्रक्रिया के अंर्तगत उसे कठोर दण्ड दिया जा सकता है। उसे जेल की यात्रा करनी पड़ सकती है जहां पर उसे कई प्रकार की यातनाओं से गुजरना पड़ सकता है। यद्यपि चीन की इस प्रकार की व्यवस्था में कुछ अधिक कठोरता दिखाई देती है, परंतु राष्ट्र प्रमुख के सम्मान को दृष्टिगत रखते हुए इस प्रकार की व्यवस्था को एकदम नकारा भी नहीं जा सकता। ब्रिटेन सहित सारे यूरोप के कई देशों में अपने राष्ट्र प्रमुख के विरुद्ध लोगों की अनावश्यक आलोचना को नियंत्रित करने के लिए न्यायालय कठोर दृष्टिकोण अपनाते हैं। इसका केवल एक ही उद्देश्य है कि मर्यादा हर स्थिति में बनी रहनी चाहिए। राजनीतिक मर्यादा के भंग होने का अर्थ होता है देश को अराजकता में धकेल देना। भारत में यदि कुछ लोग युवा पीढ़ी को बिगाड़ कर इसी प्रकार की स्थिति पैदा करना चाहते हैं तो उनके प्रति भी न्यायालय को कठोर होना चाहिए। जहां तक अमेरिका की बात है तो वहां पर राष्ट्रपति के विरुद्ध आलोचना के कुछ अधिक अधिकार वहां के नागरिकों को दिए गए हैं। यद्यपि वहां भी उस समय किसी भी नागरिक के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकती है जब कोई नागरिक द्वारा सीधी हिंसक धमकी दी गई हो, दंगे भड़काने का प्रयास किया गया हो या पूर्णतया झूठे तथ्य प्रस्तुत कर मानहानि की गई हो।
आज हमारे देश में सोशल मीडिया पर चल रही गाली गलौज को रोकने के लिए भी कठोर कानून बनाने की आवश्यकता है। भाषण और अभिव्यक्ति की असीमित स्वतंत्रता देना देश के नागरिकों के मध्य विष घोलने को प्रोत्साहित करने जैसा होता है। सरकार को इस ओर तुरंत ध्यान देना चाहिए।
(डॉ राकेश कुमार आर्य )
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
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