Breaking News

सोनिया के सामने नाक रगड़ती ममता बनर्जी…

जेडी न्यूज विजन…..

टीएमसी प्रमुख और बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए यह समय बहुत ही विपरीत चल रहा है। उन्होंने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में हिंदुओं के विरुद्ध जिस प्रकार की नीति अपनाई, उसके परिणाम उनके लिए बहुत कष्टकर सिद्ध हो रहे हैं। उनकी तानाशाही पूरी तरह झड़ गई है और अब वह असहायावस्था में अपनी पुरानी पार्टी कांग्रेस अर्थात सोनिया गांधी की शरण में पहुंच गई हैं । जिस सोनिया को कभी उन्होंने ‘ विदेशी बहू ‘ के नाम पर छोड़ दिया था, आज वही ‘विदेशी बहू’ ममता बनर्जी को अपनी नैया पार कराने में सहायक दिखाई दे रही हैं। तनिक कल्पना कीजिए कि यदि ममता बनर्जी इस बार भी पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार बनाने में सफल हो गई होतीं तो क्या होता ? तब निश्चित रूप से वह कांग्रेस को भी अपने पैरों में लेटने के लिए मजबूर करती हुई दिखाई देतीं। सत्ता का नशा ही अलग होता है और जब ममता बनर्जी की बात हो तो उन पर तो सत्ता का नशा सिर चढ़कर बोलता है । उन्होंने कभी भाजपा के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई को अपने घर पर बुलाकर अपनी खुशामद करवाई थी। यही स्थिति उनकी अब बाद में इंडिया गठबंधन में रहते हुए कांग्रेस के लिए दिखाई देती थी। अपने राजनीतिक विरोधी से ममता बनर्जी अपने सामने नाक रगड़वाने में विश्वास करती हैं । पर अब विपरीत हवा चल गई है। जिसके चलते ममता बनर्जी अपने स्वभाव को भूलने का नाटक करते हुए कांग्रेस के दरवाजे पर पहुंच गई हैं। उन्हें अपनी पार्टी और अपना सम्मान बचाना बहुत कठिन दिखाई दे रहा है। इसीलिए वह स्वयं ही सोनिया गांधी की शरण में चली गईं। सब कुछ लुटने के बाद और चारों ओर वीरानगी छाने के बाद उन्हें अपना पुराना घर याद आया है। सोनिया गांधी मानो इस प्रकार की स्थिति के लिए टकटकी लगाये बैठी थीं। उन्होंने ममता बनर्जी का गले लगा कर स्वागत किया। उन्हें भी लगता है कि इस समय ‘ चले हुए कारतूस ‘ भी उनके किले को मजबूत कर सकते हैं ?
सोनिया गांधी को ज्ञान होना चाहिए कि चले हुए कारतूस कबाड़ तो बढ़ा सकते हैं, परंतु वह कोई सुधार नहीं कर सकते अर्थात उनसे किले की रक्षा नहीं हो सकती। जिनके स्वयं के घर में आग लग रही हो वह दूसरों के घर में क्या कर पाएंगे ? यह बात बहुत विचारणीय है। जहां तक ममता बनर्जी की बात है तो वह अपने घर को जलते देखकर उस पर पानी डालने की क्षमता भी खो चुकी हैं। अपने घर को जलते छोड़कर वह कांग्रेस के घर में जा बैठी हैं। इससे पता चलता है कि वह इस समय कितनी हताश हो चुकी हैं ? अपने कर्मों के फल से डरी हुई ममता बनर्जी नैतिक रूप से टूट चुकी हैं। उनके विधायकों ने उनका साथ छोड़ा और अब दिल्ली में उनके बीस सांसदों ने भी उनका साथ छोड़ दिया है।पार्टी के कार्यकर्ता भी साथ छोड़ रहे हैं और ब्लॉक लेवल के उनकी पार्टी के प्रतिनिधि भी साथ छोड़ने में देरी नहीं कर रहे हैं। जनता से अपनी चमड़ी बचाने के लिए उनके विधायक, सांसद, पार्टी कार्यकर्ता सब भाग रहे हैं और ममता बनर्जी उनकी ओर देख भी नहीं पा रही हैं। 10 जून 2026 को टीएमसी सांसद सुष्मिता देव ने भी संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा से और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से त्यागपत्र देकर स्पष्ट कर दिया है कि वह भी डूबती हुई टीएमसी के साथ नहीं हैं। उनका स्पष्ट मंतव्य है कि जिस महिला ने मुख्यमंत्री रहते हुए पार्टी की दुर्गति की अब वह स्वयं ही इस दुर्गति को सहन करे। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने टीएमसी सांसद सुष्मिता देव से मिलने का समय देकर लोगों को यह सोचने के लिए विवश कर दिया है कि इस मुलाकात का एक अर्थ सांसद सुष्मिता देव का बीजेपी में आना तो नहीं है ? ताश के पत्तों की तरह बिखरती हुई पार्टी को ममता बनर्जी संभाल नहीं पा रही हैं । ऐसे में यदि वह कांग्रेस के पास जा रही हैं तो वहां रहकर भी वह कुछ विशेष करने वाली नहीं हैं । परंतु इतना अवश्य है कि वह कांग्रेस से मिलकर अपने भविष्य को सुधारने की कोशिश कर रही हैं । वह चाहती हैं कि कांग्रेस उन्हें किसी तरीके से राज्यसभा में भेजने में सहायता करे। उधर कांग्रेस ने भी बड़ी शर्त ममता बनर्जी के सामने रख दी है । उसने स्पष्ट कर दिया है कि यदि आप अपनी पार्टी का विलय हमारी पार्टी में करती हैं तो आपके बारे में सोचा जा सकता है।
अब मरता क्या नहीं करता ? सचमुच ममता बनर्जी के लिए यही स्थिति बन चुकी है। वृहद बांग्लादेश के सपने संजोकर अपनी जिस ‘ बड़ी योजना’ पर वह कार्य कर रही थीं,उनके वे सारे सपने चकनाचूर हो गए हैं। उन्हें अपना भविष्य दिखाई दे रहा है कि वह शीघ्र ही अपनी राजनीतिक कब्र में आराम कर रही होंगी । उससे बचने के लिए वह अंतिम दौर की छटपटाहट दिखा रही हैं। कांग्रेस ने यदि उनकी विनती को स्वीकार नहीं किया तो उनकी राजनीतिक हत्या निश्चित है। परन्तु इस हत्या में किसी और का कोई दोष नहीं है इसे उनके स्वयं के द्वारा की गई आत्महत्या माना जाना चाहिए, क्योंकि उनके पाप कर्म ही उन्हें डूबा रहे हैं। उनके साथ जो कुछ हो रहा है वह कल्पनातीत नहीं है, आशातीत भी नहीं है बल्कि उनके साथ ऐसा होगा ? – ऐसी कल्पना भी की जा सकती थी और आशा भी की जा सकती थी। यदि वह कांग्रेस में जाती हैं तो निश्चित रूप से उनका महत्व कम हो जाएगा। अभी कल परसों तक जो ममता बनर्जी विपक्ष की धुरी बनने की योजना पर काम कर रही थीं और अपने आप को भविष्य का प्रधानमंत्री दिखाने में किसी प्रकार का संकोच नहीं करती थीं, आज वह कांग्रेस के रहमोकरम पर राजनीति करती हुई दिखाई देंगी। उन्हें विपक्ष का कोई भी नेता घास नहीं डालेगा। ऐसी स्थिति में राहुल गांधी और अखिलेश यादव का कद बढ़ना निश्चित है। यह अलग बात है कि देश का जनमानस इन दोनों के बारे में भी क्या सोचता है और उन्हें अपने भविष्य का नायक मानता है या नहीं, यह देखना अभी शेष है। राजनीति का तकाजा है कि ममता बनर्जी को इस समय कांग्रेस भी घास न डाले। इससे पार्टी को कोई लाभ नहीं होने वाला। उल्टे उसके राजनीतिक विरोधी उस पर यह आरोप लगाएंगे कि ममता बनर्जी के शासनकाल में हिंदुओं के विरुद्ध जो कुछ हो रहा था,वह कांग्रेस की सहमति से हो रहा था। यदि कांग्रेस इस प्रकार के आरोप लगवाने के लिए मानसिक रूप से तैयार है तो वह अपनी फजीहत करवाने के लिए स्वतंत्र है।

 

(डॉ राकेश कुमार आर्य)
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )

About admin

Check Also

यूपी के मदरसों में अब बायोमेट्रिक हाजिरी होगी जरूरी …

मौलाना से लेकर स्टूडेंट्स तक सब लगाएंगे अटेंडेंस जेडी न्यूज विजन… लखनऊ : :  उत्तर …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *