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स्वामी दयानंद जी महाराज मनु द्वारा प्रतिपादित शक्ति पृथक्करण के इस सिद्धांत पर अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखते हैं ” क्योंकि विशेष सहाय के बिना जो सुगम कर्म है वह भी एक के करने में कठिन हो जाता है। जब ऐसा है तो महान राज्य कर्म एक से कैसे हो सकता है ? इसलिए एक को राजा और एक की बुद्धि पर राज्य के कार्य को निर्भर रखना बहुत ही बुरा काम है।” ( सत्यार्थ प्रकाश 146 )
स्पष्ट है कि जिन-जिन देशों में जिन-जिन कालों में सारी शक्तियों का केंद्र एक हाथों में रहा है, तब-तब वहां पर सृष्टि नियमों और महर्षि मनु की व्यवस्था के विरुद्ध कार्य हुआ है।
संसार में जितने भर भी मुस्लिम बादशाह हुए हैं ,उनमें से अधिकांश ऐसे रहे हैं जिन्हें न्यायशास्त्र का कोई प्रारंभिक ज्ञान भी नहीं था। इसी प्रकार क्रिश्चियन बादशाहों का भी हाल रहा है। जब इस प्रकार की व्यवस्था को तोड़कर शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को लागू किया गया तो उस समय के लिए हमको मानना चाहिए कि तब हमने महर्षि मनु के सिद्धांत को ही लागू किया था।
मुस्लिम और क्रिश्चियन सम्राट या बादशाह यदि संसार पर अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए रक्तपात करते रहे तो यह प्राचीन भारतीय सम्राटों की वह परंपरा थी, जिसमें वह संपूर्ण भूमंडल पर अपना साम्राज्य चक्रवर्ती सम्राट बनकर स्थापित किया करते थे। परंतु उनका चिंतन जहां पूर्णतया सात्विक होता था, वहीं मुस्लिम और क्रिश्चियन सम्राटों या बादशाहों का चिंतन पूर्णतया तामसिक होता था । जिसमें रक्तपात के अतिरिक्त कुछ नहीं होता था।
वर्तमान विद्वानों का मत
वर्तमान शासन प्रणाली के विषय में विद्वानों का मत है कि लोकतंत्र शासन प्रणाली प्रायः ( शासन ) क्षमता से शून्य होती है। प्रसिद्ध लेखक ट्रीटस्के ने एक आलंकारिक चित्र का उल्लेख किया है । जिसमें कि लोकतंत्र शासन को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है जो चीखती चिल्लाती भीड़ से घिरा हुआ है। जब राज्यशक्ति अशिक्षित और गैर जिम्मेदार लोगों के हाथ में दे दी जाती है तो उसमें क्षमता आ ही कैसे सकती है ? जैसे एक कुशल गडरिया सैकड़ों भेड़ों को अपनी इच्छानुसार चलाता है, वैसे ही लोकतंत्र राज्यों में कतिपय राजनीतिक नेता जनता को अपनी इच्छानुसार हांकने में सफल हो जाते हैं। सांसद तथा राज्यों की विधानसभाओं के लिए जो सदस्य निर्वाचित होते हैं वे न केवल अयोग्य होते हैं अपितु जिन लोगों के हाथों में शासन की बागडोर होती है, वह भी अपना काम भलीभांति नहीं कर सकते। उन्हें सदा भय बना रहता है कि राजनीतिक नेता उनकी किसी बात से असंतुष्ट न हो जाएं।”
उपरोक्त शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत की समीक्षा करने पर पता चलता है कि प्रत्येक ऐसा अधिकारी जो निचले स्तर पर नियुक्त होता था, वह अपने से ऊपर के अधिकारी या शासन के व्यक्ति को प्रतिदिन के समाचार प्रेषित करता था। जिससे शीघ्रातिशीघ्र उपरोक्त समाचार राजा तक पहुंच जाते थे।
आज के सूचना विभाग के जनक- महर्षि मनु
आज के डाक विभाग का शुभारंभ महर्षि मनु के समय से ही हुआ। इसे समझने के लिए उस समय के सूचना तंत्र को समझने की आवश्यकता है। प्रशासनिक लोग नीचे से ऊपर तक यथाशीघ्र समाचार प्रेषित करने में कुशल होते थे। इसके लिए घोड़े आदि का प्रयोग किया जाता था। यदि किसी प्रकार का हमला कहीं से होता था या देश विरोधी शक्तियां कहीं पर उपद्रव कर रही होती थीं तो उनकी सूचना भी बहुत शीघ्रता से राजा तक पहुंच जाती थी। इसलिए इस प्रकार की भ्रांति पाल लेना कि आज का डाक विभाग या सूचना तंत्र किसी मुस्लिम शासक या अंग्रेजी शासन की देन है, हमारी अज्ञानता का परिचायक है।
मनु महाराज जी की व्यवस्था के अंतर्गत देश की राजधानी को केंद्रीय कार्यालय कहा जाता था, कभी-कभी इसे राजा का किला भी बोलते थे। प्रत्येक नगर में एक सचिवालय की स्थापना की जाती थी जिसे आजकल नगर पालिका कार्यालय कहा जाता है। 1000 गांवों पर सहस्राधीश का कार्यालय -सौ गांवों पर एक शताधीश का कार्यालय, बीस गांवों पर एक विंशति-अधीश का कार्यालय, दश गांवों पर एक दशाधीश का कार्यालय, पांच गांवों पर एक पंचाधीश का कार्यालय,दो और तीन गांवों पर एक मुखिया का कार्यालय , गांव पर गांव के मुखिया का कार्यालय होता था। मनुस्मृति के सातवें अध्याय के श्लोक संख्या 115- 117 में यह व्यवस्था की गई है कि इन राज्य कार्यालयों के प्रभारी अपने से ऊपर के राज्य कार्यालय को प्रतिदिन की गतिविधियों से सूचित करें। इन सारी सूचनाओं को जिस संबंधित मंत्री के पास भेजा जाता था, वह इन पर बहुत ध्यानपूर्वक चिंतन करता था । आलस्यरहित होकर इन पर मनन करता था और साथ ही यथोचित समाधान भी देता था।
राजा का प्रतिनिधि कौन हो सकता था ?
यदि राजा रुग्ण – अवस्था में है या किसी भी कारण से अशक्त हो गया है तो ऐसी स्थिति में उसके स्थान पर कार्य करने की शक्ति किसकी होगी ? वर्तमान संविधान में देश के राष्ट्रपति के लिए स्पष्ट किया गया है कि यदि राष्ट्रपति ने पद त्याग कर दिया है या किसी कारण से उसे देश से बाहर जाना पड़ गया है या उस पर महाभियोग आ गया है या किसी दूसरे कारण से वह अपने पदीय दायित्वों का निर्वाह करने में सक्षम नहीं है तो ऐसी स्थिति में देश के उपराष्ट्रपति को उसका कार्यभार तात्कालिक आधार पर सौंप दिया जाता है और यदि किन्हीं कारणों से उपराष्ट्रपति भी उपलब्ध नहीं है तो देश के सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति के दायित्वों का निर्वाह करेगा।
यदि ध्यान से देखा जाए तो भारत सहित किसी भी देश के संविधान में की गई ऐसी व्यवस्था के लिए भी हमें महर्षि मनु के आदि संविधान का ऋणी होना पड़ेगा। जहां पर राजधर्म संबंधी व्यवस्थाओं में यह स्पष्ट किया गया है कि प्रजा के कार्यों की देखभाल करने में रुग्णता आदि के कारण अशक्त होने पर उसे अपने आसन पर न्यायकारी धर्मज्ञ तथा बुद्धिमान जितेंद्रिय ,कुलीन सबसे प्रधान अमात्य अर्थात मंत्री को बिठा देवे अर्थात रुग्णावस्था में प्रधान अमात्य को अपने स्थान पर राज्य कार्य संपादन के लिए नियुक्त करे।
हम देखते हैं कि यदि हमारे देश का प्रधानमंत्री राजधानी से बाहर है या देश से भी बाहर है और उनकी अनुपस्थिति में मंत्रिमंडल की बैठक आहूत करनी पड़ जाए तो उस बैठक की अध्यक्षता वरिष्ठतम कैबिनेट मंत्री ही करता है। यह व्यवस्था हमें मनु महाराज द्वारा ही प्रदत्त की गई है।
राजा होकर न्याय करे, न्यायाधीश होकर भी न्याय करे और पंच या मध्यस्थ होकर भी न्याय करे, पिता होकर भी न्याय करे, गुरु होकर भी न्याय करे, घर का वरिष्ठ सदस्य होकर कनिष्ठ सदस्यों के साथ न्याय करे, बड़ा भाई होकर छोटे भाई के साथ न्याय करे – ये सारी की सारी व्यवस्थाएं हमको मनु महाराज की देन हैं। ये सारी परंपराएं किसी न किसी रूप में आज तक भी जीवित हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि महर्षि मनु के संविधान ने भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के निर्माण में कितना महत्वपूर्ण योगदान दिया है ? राजनीति का जो भी शुभ लक्षण या शुभ पक्ष हमें आज भी यथावत धर्मानुकूल कार्य करता हुआ दिखाई देता है या कहिए कि राजनीति में जितनी भी धर्मानुकूल व्यवस्थाएं और परंपराएं हैं, वे सब भी मनुस्मृति की ही देन हैं । उससे अलग कोई व्यवस्था हो ही नहीं सकती।
मनु की विदेश नीति
मनु महाराज ने विदेश नीति के संदर्भ में भी बहुत सुंदर व्यवस्था की है। उनका कहना है कि ” अपने राज्य के समीपवर्ती राजा को और शत्रु राजा की सेवा सहायता करने वाले राजा को शत्रु ही समझना चाहिए। शत्रु से भिन्न अर्थात शत्रु से विपरीत आचरण करने वाले अर्थात सेवा सहायता करने वाले राजा को और शत्रु राजा की सीमा से लगे अगले राजा को मित्र और इन दोनों से भिन्न प्रवृत्ति वाले राजा को जो न सहायता करे न विरोध करे, उसे उदासीन अर्थात ( अर्थात तटस्थ= न्यूट्रल ) राजा समझना चाहिए।”
मनु के इस सिद्धांत को आज के राजनीतिशास्त्री यथावत मानते हैं। हम सभी लोग व्यवहार की भाषा में भी कहते हैं कि शत्रु का शत्रु अपना मित्र होता है। अब तनिक विचार कीजिए कि यह सिद्धांत कब से चला आ रहा है ? इस संबंध में हमने अपनी पुस्तक ” मनु और भारत की राज्यव्यवस्था ” के अध्याय 16 में ‘ मनु की विदेश नीति ‘ शीर्षक के अंतर्गत विस्तार से चर्चा की है। इस संबंध में वहां से आप अधिक जानकारी ले सकते हैं।
(डॉ राकेश कुमार आर्य)
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