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यह कविता/पाठ श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम को “अपूर्ण” नहीं, बल्कि “पूर्ण” और आध्यात्मिक प्रेम के रूप में प्रस्तुत करता है।:
प्रेम हमारा पूर्ण है, राधा
संयोग से ही संयोग बना था,
मेरे जीवन में तेरा आना।
नहीं, हमारी प्रीत अधूरी,
प्रेम हमारा पूर्ण है, राधा।
मन-मंदिर में तुम्हीं प्रतिष्ठित, बनी प्रेम की मूरत प्यारी। मैं अनभिज्ञ सा प्रेम पुजारी, नहीं हो तुम कोई कल्पित नारी।
नहीं, हमारी प्रीत अधूरी,
प्रेम हमारा पूर्ण है, राधा।
एक प्रश्न मैं तुमसे करता ,क्या तुम मुझसे दूर हो राधा।
श्वास बनी तन मन बसती हो, बनकर अनुपम प्रेम की धारा॥
नहीं, हमारी प्रीत अधूरी,
प्रेम हमारा पूर्ण है, राधा।
क्या तुम भूल गई हो राधा? वंशीवट कमलों का खिलना ।सप्तसुरों की सरगम में भी,बाँसुरी गाती राधा-राधा॥
नहीं, हमारी प्रीत अधूरी,
प्रेम हमारा पूर्ण है, राधा।
मधुबन में वह महारास भी ,क्या मेरी कोरी लीला थी? त्रिभुवन की शिव शक्ति भी इस महामिलन की शान बनी थी॥
नहीं, हमारी प्रीत अधूरी,
प्रेम हमारा पूर्ण है, राधा।
भाण्डीरवन में सप्तपदी पर,हमने सात वचन भरे थे।
विवाह-मंत्र वे ब्रह्मा जी के,कोई कल्पित पुष्प नहीं थे॥
नहीं, हमारी प्रीत अधूरी,
प्रेम हमारा पूर्ण है, राधा।
एक दिन रुक्मिणी ने पूछा था,कौन है ब्रज की गोपी राधा?मैंने मुस्काकर जब देखा, मुझमें उसने तुमको देखा॥
नहीं, हमारी प्रीत अधूरी,
प्रेम हमारा पूर्ण है, राधा।
गिरी धरा पर बेसुध होकर,चेत हुआ तो झट से पूछा।
तुममें राधा प्रतिबिंबित थी,यह सच था या स्वन मेरा था॥
नहीं हमारी प्रीति अधूरी,
प्रेम हमारा पूर्ण है राधा।
जब मैं तुमसे मिलने, राधा, द्वारिका से ब्रज आया था।
तेरे “द्वारिकाधीश” शब्द से,हृदय का कोना रोया था॥
नहीं, हमारी प्रीत अधूरी,
प्रेम हमारा पूर्ण है, राधा।
तेरे सजल नयन देखकर,मन की पीड़ा कह न सका था।
तेरे शब्द हलाहल पीकर पीड़ा सह तुमको पाया था॥
नहीं, हमारी प्रीत अधूरी,
प्रेम हमारा पूर्ण है, राधा,
प्रेम हमारा पूर्ण है, राधा,
प्रेम हमारा पूर्ण है राधा॥
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