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बिना हिन्दी लगें मुस्कानें अधूरी….
खड़ी कहो के कहो मानक,
मैं बानी अनुकंपनकी।
मैं हूँ हिन्दुस्तान भूखंडकी,
लिपि देवनागरी हिन्दी॥
जन जन उरसे खुद सँवरी,
ग्यारह प्रांतीय मॉं बोली।
दे अपनापन संस्कृत सुता, क्षेत्रीय भाषा संग श्रृंगारी धूलि।
राष्ट्रगान संगीत मधुरां, मॉं हिन्दीकी गोद मर्दानी खेलीं ॥
हिन्दी है महा सरिता धारा,
सरल मधुर जग व्यवहारा।
जब पढ़ें हिन्दी रस श्रृंगारी, चारु चंद्रसी खील उठे जवानी।
तीसरी मुख्य भाषा वैश्वी, राजभाषा है ज्ञानी बानी॥
क्युं न उछल पड़े पढ़कर,
भारतेन्दु मैथिली दिनकर।
बड़ा पटल पर राज है तेरा, करें गौरवान्वित भूखंड भक्ति।
क्रान्तिपथ पर है अग्रेसर, हिन्दी भाषाकी विराट शक्ति॥
सम्मान हिंदीका स्वयं उजाला,
साहित्य युगी सांस्कृतिक पाला।
हिन्दी उपवनके शब्दपुष्प सौरभी, दिन है चौदह सितम्बर श्रेयी।
जब हम बोले हिन्दी बानी, मधुर लगे ज़बान हमारी॥
महिमावंत भाषा है हिन्दी यारों,
कवि संत संस्कार धरे उपहारों।
प्यारसे छा गयी परम जनश्रेयी, हिन्दी भाषा मुग्ध मधुरी।
झुमो ‘ आकाशदीप’ संग बंधु, बिना हिन्दी सबकी मुस्कानें अधूरी॥
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