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धौलपुर से द्वारका तक…एक यात्रा, एक संवाद और अपने कान्हा का अपनापन
संस्मरणों की खूबसूरती यही है कि कभी-कभी पूरी यात्रा एक छोटे-से प्रसंग में सिमट जाती है। धौलपुर के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. आई. पी. सिंह की द्वारका-यात्रा से जुड़ा यह प्रसंग भी ऐसा ही है—छोटा-सा, लेकिन अपने भीतर आस्था, विनोद और अपनी मिट्टी के प्रति गहरा अपनापन समेटे हुए।
धौलपुर की अपनी पौराणिक स्मृतियाँ हैं। यहाँ मुचुकुंद महाराज का प्रसिद्ध धाम और कुंड है, जिन्हें लोक-आस्था में बड़े श्रद्धा-भाव से पूजा जाता है। मुचुकुंद महाराज को “तीर्थों का भांजा” मानने की परंपरा आज भी यहाँ जीवित है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की देवषष्ठी, जिसे स्थानीय रूप से बलदेव छठ भी कहा जाता है, यहाँ मेला लगता है और अनेक लोक-परंपराएँ श्रद्धा के साथ निभाई जाती हैं। देश-विदेश से लोग इस स्थल को देखने भी आते हैं।
इन्हीं पौराणिक और सांस्कृतिक स्मृतियों से जुड़े धौलपुर के डॉ. आई. पी. सिंह के मन में एक समय द्वारकाधीश के दर्शन की तीव्र इच्छा हुई। वे द्वारका की यात्रा पर निकल पड़े।
द्वारका में दर्शन की प्रतीक्षा….
द्वारका पहुँचकर वे द्वारकाधीश मंदिर में दर्शन की प्रतीक्षा कर रहे थे। मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ थी। चारों ओर तीर्थयात्रियों की चहल-पहल थी और हर कोई अपने आराध्य के दर्शन के लिए उत्सुक था।
इसी बीच एक पंडित जी डॉ. सिंह के पास आए। उन्होंने कहा—
“आइए, आपको द्वारकाधीश के दर्शन करा देते हैं, पूजा भी करवा देंगे।”
सामान्यतः कोई भी श्रद्धालु ऐसी बात सुनकर प्रसन्न होता। लेकिन डॉ. सिंह का उत्तर कुछ अलग ही था।
उन्होंने पंडित जी से कहा—
“पहले उनसे जाकर पूछिए कि वे यहाँ आए कैसे? यहाँ आने से पहले कहाँ छिपे थे?”
डॉ. सिंह का यह सवाल सुनकर पंडित जी शायद ठिठक गए। उन्हें समझ में नहीं आया कि दर्शन के लिए आए इस श्रद्धालु ने भगवान से जुड़ा ऐसा सवाल क्यों कर दिया।
लेकिन डॉ. सिंह के लिए यह केवल सवाल नहीं था। उनके भीतर धौलपुर की अपनी पौराणिक स्मृतियाँ भी थीं—मुचुकुंद महाराज, कालयवन और कृष्ण-कथा की वे स्मृतियाँ, जिनसे उनका अपना नगर जुड़ा हुआ था।
फिर आया वह वाक्य…
डॉ. सिंह यहीं नहीं रुके। उन्होंने पंडित जी से आगे कहा—
“अगर यहाँ ठीक नहीं हो तो उनसे कहिएगा, चलिए हमारे साथ धौलपुर। रणछोड़ की नगरी से आए हैं हम, अपने कान्हा को अपने साथ ले जाएँगे।”
पंडित जी देखते रह गए।
यह वाक्य इस पूरे संस्मरण की आत्मा है।
डॉ. सिंह भगवान के दर्शन करने द्वारका आए थे, लेकिन उनके शब्दों में भगवान से मिलने वाला एक भक्त नहीं, अपने कान्हा से मिलने आया एक आत्मीय व्यक्ति दिखाई देता है।
उनके लिए कृष्ण केवल द्वारकाधीश नहीं थे। वे “अपने कान्हा” थे।
और यही संबोधन इस प्रसंग को साधारण हास्य से उठाकर आत्मीयता के स्तर तक ले जाता है।
विनोद में छिपा धौलपुर….
डॉ. सिंह के कथन में एक ओर कृष्ण के प्रति अपनापन है, तो दूसरी ओर अपने धौलपुर के प्रति सहज गर्व भी।
मानो वे कह रहे हों—…
“आप द्वारका में विराजते हैं तो द्वारकाधीश हैं, लेकिन हमारे लिए तो अपने कान्हा ही हैं। हम धौलपुर से आए हैं; आपकी कथा की स्मृतियाँ हमारी धरती से भी जुड़ी हैं। इसलिए जरूरत पड़े तो हमारे साथ धौलपुर चलिए।”
यहाँ डॉ. सिंह की साहित्यिक दृष्टि और उनका विनोदी स्वभाव दोनों साथ दिखाई देते हैं। उन्होंने अपने नगर के गौरव को किसी गंभीर वक्तव्य में नहीं, बल्कि एक सहज और चुटीले संवाद में व्यक्त कर दिया।
द्वारका से लौटती एक स्मृति….
डॉ. सिंह की द्वारका-यात्रा का यह प्रसंग इसलिए याद रह जाता है कि इसमें यात्रा का दृश्य भी है और संस्मरण की आत्मीयता भी।
वे दर्शन करने गए थे द्वारकाधीश के, लेकिन वहाँ उन्होंने अपने कान्हा को धौलपुर चलने का निमंत्रण दे दिया।
द्वारका उनके सामने थी, लेकिन मन में धौलपुर था।
और शायद यही इस छोटे-से प्रसंग की सबसे बड़ी खूबसूरती है—
भगवान जहाँ भी हों, भक्त उन्हें अपने ही मानता है।
डॉ. सिंह के शब्दों में यही अपनापन मुस्कराता हुआ सुनाई देता है—
“रणछोड़ की नगरी से आए हैं हम, अपने कान्हा को अपने साथ ले जाएँगे।”
यही वह क्षण है जहाँ धौलपुर से द्वारका की यात्रा केवल भौगोलिक दूरी नहीं रह जाती, बल्कि अपनी मिट्टी से अपने आराध्य तक पहुँचने वाली एक आत्मीय यात्रा बन जाती है।

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