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भारतीय राजनीति का इस समय सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यही बना हुआ है कि “नरेंद्र मोदी के बाद कौन?” साल 2026 का जून का महीना चल रहा है और देश की सियासी बिसात पर विपक्ष के लगभग सभी पुराने समीकरण ध्वस्त हो चुके हैं।
देश में तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक (DMK), अन्नाद्रमुक, सीपीएम, उद्धव गुट और शरद पवार गुट जैसी तमाम क्षेत्रीय ताकतें पहले के मुकाबले कमजोर हो चली हैं।
दूसरी तरफ, कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर जरूर थोड़ी बढ़त बनाई है, लेकिन जब बात देश के अगले प्रधानमंत्री की आती है तो ‘मूड ऑफ द नेशन’ (2026) जैसे बड़े सर्वे, राजनीतिक पंडितों के चुनावी गणित और सितारों की चाल को मिलाकर देखें, तो भविष्य की धुंधली तस्वीर काफी हद तक साफ होने लगती है। आइए समझते हैं कि सर्वे, ज्योतिष और राजनीतिक विश्लेषण के अनुसार इस महा-रेस में कौन कहां खड़ा है।
भाजपा का आंतरिक दंगल: चाणक्य अमित शाह बनाम फायरब्रांड योगी आदित्यनाथ
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर पीएम मोदी के उत्तराधिकार की जंग मुख्य रूप से देश के दो सबसे बड़े ‘मास लीडर्स’ के इर्द-गिर्द ही सिमटती हुई नजर आ रही है। इस रेस में पहले नंबर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह हैं और दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ।
अमित शाह: चाणक्य की दावेदारी और कुंडली का महा राजयोग
राजनीतिक गलियारों में अमित शाह को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सबसे स्वाभाविक, वफादार और विश्वसनीय उत्तराधिकारी माना जाता है। संगठन को जमीन पर खड़ा करने से लेकर केंद्र सरकार चलाने तक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक शाह का अनुभव सबसे व्यापक है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, शाह की कुंडली में साल 2040 तक गुरु की महादशा चल रही है। वहीं, अक्टूबर 2026 से शुरू होने वाली मंगल की महादशा उनके सियासी ग्राफ को एक नए और सर्वोच्च शिखर पर ले जा सकती है।
हालांकि, मेष राशि होने के कारण अमित शाह पर इस समय शनि की साढ़ेसाती का पहला चरण शुरू हो चुका है, जो उनके लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। यह गोचर या तो उन्हें सत्ता के सर्वोच्च सिंहासन पर बैठाएगा या फिर कोई अप्रत्याशित चुनौती देगा। शाह के सामने सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और संगठन का एक बड़ा धड़ा योगी आदित्यनाथ को बेहद पसंद करता है। लेकिन शाह का पलड़ा इसलिए भारी है क्योंकि उनके पास केंद्र सरकार का लंबा अनुभव है, जो फिलहाल योगी के पास नहीं है। जानकारों की मानें तो स्वास्थ्य संबंधी दिक्कत या कोई बहुत बड़ा राजनीतिक भूकंप ही अब उनका रास्ता रोक सकता है।
योगी आदित्यनाथ: भगवा फायरब्रांड का बढ़ता कद और दिल्ली का रास्ता यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी सख्त प्रशासनिक शैली, ‘बुलडोजर नीति’ और प्रखर हिंदुत्ववादी छवि के कारण देश भर के करोड़ों युवाओं और कार्यकर्ताओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। ज्योतिष के नजरिए से देखें तो योगी की कुंडली में शनि-शुक्र का परिवर्तन योग है और वर्तमान में शुक्र की महादशा एक्टिव है। लाल किताब के विशेषज्ञों के अनुसार, साल 2030 तक गुरु और सूर्य की महादशाएं मिलकर उनकी कुंडली में ‘प्रबल राजयोग’ का निर्माण कर रही हैं। ज्योतिषियों का यह भी मानना है कि सितंबर 2026 से नवंबर 2029 के बीच उनका केंद्र यानी दिल्ली की राजनीति में आना लगभग तय है।
व्यावहारिक राजनीति की बात करें तो उत्तर प्रदेश के भीतर भी अब भाजपा दूरगामी रणनीति पर काम कर रही है। राज्य के जातिगत समीकरणों को साधने और गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक को एकजुट रखने के लिए भाजपा आलाकमान योगी को दिल्ली शिफ्ट कर यूपी की कमान किसी और को सौंप सकता है। हाल ही में केंद्रीय नेतृत्व के बेहद करीबी माने जाने वाले कद्दावर कुर्मी नेता पंकज चौधरी को यूपी भाजपा का नया अध्यक्ष बनाया जाना इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
लेकिन योगी के सामने भी एक बड़ी चेतावनी है। कुंभ राशि होने के कारण उन पर शनि की साढ़ेसाती का अंतिम दौर चल रहा है, जो जून 2027 में समाप्त होगा। हाल ही में हुए कुछ विवादों जैसे यूजीसी, एसआईआर और शंकराचार्य प्रकरण ने उनके सामने थोड़ी मुश्किलें जरूर खड़ी की हैं। ज्योतिषीय निष्कर्ष यहाँ एक बड़ी चेतावनी भी देता है कि “यदि योगी आदित्यनाथ को आगे बढ़ने से जबरन रोकने की कोशिश की गई, तो संघ और भाजपा के भीतर एक बड़ी बिखराव की स्थिति भी बन सकती है।”
रेस में शामिल अन्य संभावित चेहरे और विपक्ष की बिसात
अगर किसी अप्रत्याशित स्थिति में इन दोनों नामों पर सहमति नहीं बनती है, तो भाजपा के पास नितिन गडकरी, एस जयशंकर, शिवराज सिंह चौहान और निर्मला सीतारमण जैसे अनुभवी चेहरे भी मौजूद हैं, जिनकी प्रधानमंत्री बनने की संभावना करीब 40% आंकी जा रही है।
दूसरी तरफ, अगर विपक्षी खेमे यानी इंडिया गठबंधन की बात करें तो पिछले कुछ वर्षों की अपनी राजनीतिक यात्राओं और आक्रामक रणनीतियों की बदौलत राहुल गांधी की छवि में एक बहुत बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है। साल 2026 के ताजा सर्वे साफ करते हैं कि राहुल गांधी इस समय विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद का इकलौता और सबसे मजबूत चेहरा बन चुके हैं। ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और एम.के. स्टालिन जैसे कद्दावर क्षेत्रीय नेता अब इस राष्ट्रीय रेस से लगभग बाहर हो चुके हैं, लेकिन प्रियंका गांधी वाशिन और अखिलेश यादव की मौजूदगी अभी भी रेस को त्रिकोणीय बनाए हुए है।
2029 का महासमर: लोकप्रियता में आज भी मोदी का कोई मुकाबला नहीं
देखा जाए तो संवैधानिक और व्यावहारिक तौर पर असली फैसला साल 2029 के आम चुनावों में देश की जनता ही करेगी। भाजपा के भीतर यह पूरी लड़ाई ‘शाह बनाम योगी’ के इर्द-गिर्द ही घूमेगी, जबकि विपक्ष एक बार फिर राहुल या प्रियंका गांधी के चेहरे पर दांव लगा सकता है। फिलहाल, अमित शाह अपने प्रशासनिक अनुभव और दिल्ली के समीकरणों में थोड़े आगे जरूर दिख रहे हैं, लेकिन योगी आदित्यनाथ के पीछे खड़ा भारी जनसमर्थन और संघ का अंदरूनी दबाव इस उत्तराधिकार की रेस को बेहद दिलचस्प और सस्पेंस से भरा बना देता है।
इन सब कयासों के बीच, जनवरी 2026 में आए देश के सबसे बड़े और ताजा राजनीतिक सर्वे के आंकड़े कुछ और ही हकीकत बयां करते हैं। सर्वे के मुताबिक, अगर आज भी देश में लोकसभा के चुनाव करा दिए जाएं, तो भारत के 55% लोग किसी और को नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी को ही दोबारा प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। इस सूची में राहुल गांधी 27% वोटों के साथ दूसरे नंबर पर आते हैं। साफ है कि भविष्य की रेस चाहे जो हो, लोकप्रियता के मामले में पीएम मोदी आज भी अपने विरोधियों और अपनी ही पार्टी के अन्य दावेदारों से कोसों आगे खड़े हैं।
G F….
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