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सीमित बुद्धि से असीम परमात्मा का मूल्यांकन संभव नहीं है – स्वामी जी …
लखनऊ,20 जून :: शनिवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद जी महाराज ने श्री रामकृष्ण परमहंस के वचनों के आधार पर अवतार के स्वरूप, उनकी पहचान और मनुष्य की सीमित बुद्धि पर गहन प्रकाश डाला है*। उनके अनुसार भगवान के अवतार को समझना साधारण बुद्धि के लिए अत्यंत कठिन कार्य है, क्योंकि वे बाहर से सामान्य मनुष्य की तरह दिखाई देते हैं, जबकि वास्तव में वे अनंत और विराट परमात्मा के स्वरूप होते हैं। यही कारण है कि अधिकांश लोग उन्हें उनके वास्तविक स्वरूप में पहचान नहीं पाते।
*स्वामी जी ने बताया कि श्री रामकृष्ण परमहंस का मत है कि मनुष्य का अहंकार ही सत्य को देखने में सबसे बड़ी बाधा बनता है*। जब तक व्यक्ति अपने ज्ञान, बुद्धि और अहं की सीमाओं में बंधा रहता है, तब तक वह ईश्वर के दिव्य स्वरूप को स्वीकार नहीं कर सकता। अहंकार समाप्त होने पर ही हृदय में विनम्रता आती है और ईश्वर के वास्तविक स्वरूप का अनुभव संभव होता है। *इस संदर्भ में स्वामी विवेकानंद के पूर्व रूप नरेंद्रनाथ तथा डॉ. महेंद्रलाल सरकार का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है।* प्रारंभिक समय में वे भी श्री रामकृष्ण के विराट आध्यात्मिक स्वरूप को पूरी तरह नहीं समझ सके थे। वे उन्हें एक सामान्य मानव शरीर में देखकर उनके दिव्य स्वरूप को स्वीकार करने में कठिनाई अनुभव करते थे। इससे स्पष्ट होता है कि महान बुद्धिजीवी भी केवल तर्क के आधार पर ईश्वर को नहीं समझ सकते, बल्कि इसके लिए आंतरिक शुद्धता और आध्यात्मिक अनुभव आवश्यक है।
*स्वामी जी ने समझाया कि रामचरितमानस के कागभुशुण्डि प्रसंग के माध्यम से भी यही शिक्षा मिलती है* कि जब तक जीव में अहंकार विद्यमान रहता है, तब तक वह भगवान के अवतार को पहचान नहीं सकता। कागभुशुण्डि की कथा यह बताती है कि शरणागति, विनम्रता और अहंकार का नाश ही ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का मार्ग है। जब मनुष्य अपने सीमित ज्ञान का अभिमान छोड़ देता है, तभी उसके भीतर सत्य का प्रकाश होता है। भगवान की लीला का रहस्य भी इसी विचार से जुड़ा हुआ है। ईश्वर जब मानव रूप धारण करते हैं, तो वे सामान्य मनुष्य की तरह व्यवहार करते हुए अपनी दिव्य लीला का प्रदर्शन करते हैं। जैसे कोई अभिनेता मंच पर किसी पात्र की भूमिका निभाता है, वैसे ही भगवान जीवों के कल्याण के लिए मानव रूप में अनेक लीलाएं करते हैं। उनका यह व्यवहार केवल बाहरी दृष्टि से सामान्य प्रतीत होता है, किंतु उसके पीछे गहरा आध्यात्मिक उद्देश्य छिपा होता है।
*इन शिक्षाओं का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य की समझ और बुद्धि सीमित है, जबकि परमात्मा असीम और अनंत हैं*। इसलिए उन्हें केवल तर्क और बौद्धिक मापदंडों से समझने का प्रयास अधूरा रहेगा। ईश्वर को जानने के लिए श्रद्धा, भक्ति, विनम्रता और आत्मसमर्पण का मार्ग अपनाना आवश्यक है। जब व्यक्ति अपने अहंकार का त्याग कर भगवान को उनके वास्तविक स्वरूप में स्वीकार करता है, तभी उसके जीवन में आध्यात्मिक उन्नति का द्वार खुलता है।
*निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने बताया कि* श्री रामकृष्ण परमहंस का संदेश यही है कि ईश्वर को उनकी इच्छा और स्वरूप के अनुसार स्वीकार करना ही सच्ची साधना है। सीमित बुद्धि से असीम परमात्मा का मूल्यांकन संभव नहीं है। श्रद्धा, समर्पण और अहंकार का त्याग ही मनुष्य को सत्य, शांति और ईश्वर की अनुभूति तक पहुंचाने का सर्वोत्तम मार्ग है।
*स्वामी मुक्तिनाथानंद*
अध्यक्ष
*रामकृष्ण मठ लखनऊ*
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