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लेख- इतना आसान नहीं है मदन वर्मा का माणिक होना…!
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देश के इंदौर, मध्य प्रदेश से, प्रसिद्ध साहित्य साधक मदन वर्मा माणिक देशभर में साहित्य पटल पर छाया हुआ वह नाम है जो शायद ही कोई साहित्य प्रेमी नहीं जानता हो। उनकी रगो में साहित्य की विविध कलाओं की पैनी कलम दौड़ती है पिछले 50 वर्षों से साहित्य की गद्य-पद्य व्यंग्य, कहानी, लघु कथा, समाज व श्रमिक हितों के हित में सैंकड़ों नहीं बल्कि हजारों रचनाएं सृजित हुई, सम-सामयिक लेख-कविताएं व रचनाएं देश- विदेश के बड़े-बड़े समाचार पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई। पचास सालों से निरंतर उनकी कलम सच-बेधड़क चलायमान रही पूरी रात-दिन उनका दिमाग सृजनरत रहकर नवसृजन श्रृंगार करता रहता है। इतना आसान नहीं हैं मदन वर्मा का माणिक बन जाना। बरसों का अभ्यास, मेहनत और लेखन साधना उन्होंने की है। परिस्थितियों के बदलाव,मोड़ और ईश्वर की कृपा उनके साथ रही। भगवान खजराना गणेश, महाकाल, बागेश्वर बालाजी हनुमान और माता कैलादेवी (करौली) का आशीर्वाद सदैव उनकी लेखनी में बरसा है। उन्हें नहीं पता कितना लिखा कहां-कहां छपा कितनी रचनाएं आई ये सब विस्मृत हो जाते हैं। हाथ पुनः कलम पकड़ लेते हैं कुछ लिखना है यह सोचकर सब से बेखर सदा ही हर समय हर हालत में मुस्काते रहते हैं।
प्रतिदिन जाने कितनी ही कविताएं, वृतांत, लेख, रचनाएं दिमाग से उत्सर्जित होती है और उनकी भावनाएं आत्मा से निकल उतर आती हैं और फिर अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो जाती हैं। जहां कहीं रमता है यह कवि हृदय कुछ अनोखा सोचना हैं और मानव-मजदूर के हित में रचनात्मक रूप से अपनी चहेती लेखनी से सृजन करता है। प्रसंशा, आलोचना से भ्रमित नहीं होता, छपने-छपाने की उत्सुकता हावी नहीं रहती अपनी लकीर खुद खींचता किसी और की लकीर छोटी करने की आदत नहीं। मन में किसी से द्वैश, विकार नहीं। अखबार बांटने, अखबार-पत्र-पत्रिकाओं की दुकानों पर बैठकर, पुस्तकालयों की सीढ़ियां चढ़ने का अनुभव और पुस्तकों की दुकानों ने उनकी लेखनी को मांजकर तीखा व शौर्यवान कर दिया।
यह अद्भुत सादगी सहजता सरलता लिए साहित्य साधक जिसे देख कर कोई नहीं कह सकता है यह वहीं मदन वर्मा है जो आज देश के साहित्य पटल पर चर्चित हुआ है बात करते ही पता चल जाता है वजह है उनके लेखन में समाज व प्रकृति, दुखियों के प्रति संवेदना, सहानुभूति, स्नेह है। और जब गांठ खुलती हैं तो
कलम से स्थिति-परिस्थितियों का रचनांकन करती है।
सदैव सहज सरल रहते हुए मुस्काते हुए नजर आते हैं बरबस हर कोई प्रभावित हो जाता है। शांत रहने वाला यह अद्भुत इंसान अनेक दुःखों को समेटे है।
अपने जन्म स्थल इंदौर महेश्वर के पास देवभूमि ग्राम चोली पर गर्व होता है और जो कुछ लेखनी में जादू हैं उसका श्रेय वहां के प्राचीन पाषाण निर्मित विश्व प्रसिद्ध विशाल सिद्धि विनायक गणेश जी पर हैं इसी के सामने उनके नाना के घर पर इनका जन्म हुआ है।उस देव भूमि को श्रेय देते हुए उनका मन सदा ही प्रणाम करता है। मदन वर्मा माणिक का कहना है मेरे जैसे मुझ से अच्छे इंसान भी बहुत से हैं मगर एक संवेदनशील इंसान ही लेखक बन सकता है। इतना आसान नहीं है लेखक-कवि बन जाना, इसके पीछे लंबी साधना व मेहनत होती है।
– नेहा ठाकुर ” नेह ” (कवियित्री व लेखिका)
इंदौर, मध्यप्रदेश
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