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असली माया तो अन्तर की आँख से दिखाई देती है” – बाबा उमाकान्त जी महाराज….
*स्त्री, रुपया-पैसा, महल-बंगला, मान-सम्मान और इज्जत की कुर्सी जिसको लोग माया कहते हैं वह असली माया नहीं है*
रेवाड़ी, हरियाणा परम् पूज्य परम् सन्त बाबा उमाकान्त जी महाराज ने सतसंग में बताया कि जिसे लोग माया समझते हैं, वह असली माया नहीं बल्कि माया की छाया है। स्त्री, रुपया-पैसा, महल-बंगला, मान-सम्मान और इज्जत की कुर्सी को लोग माया कहते हैं लेकिन यह असली माया नहीं है। असली माया ऊपर से आई है, नीचे उतारी गई है और अदृश्य है। ‘अदृश्य’ उसे कहते हैं जो इन बाहरी आंखों से दिखाई नहीं देती।
माया इन आंखों से नहीं देखी जा सकती बल्कि इन आंखों के बीच में स्थित तीसरी आंख, जिसे आत्म चक्षु या शिव नेत्र कहा जाता है, उससे माया दिखाई पड़ती है। माया को सन्तों और अच्छे साधकों ने देखा है, तभी माया के बारे में किताबें लिखी गईं और उपदेश दिए गए।
यह शिव नेत्र सबके अंदर है लेकिन कर्मों के अनुसार बंद हो गया है। जीव न जाने कितनी बार धरती पर मनुष्य शरीर में आया लेकिन दिव्य दृष्टि खोलने वाला कोई मिला नहीं। इसी तीसरी आंख से काल और माया का पसारा दिखाई पड़ता है। तैतीस करोड़ दुर्गा, दस करोड़ शंभू, इंद्र, वरुण, शशि, लक्ष्मी, विष्णु, शंकर तथा जिन्हें लोगों ने अल्लाह तआला, पाक परवरदिगार और गॉड कहा, वे भी उसी आंख से दिखाई पड़ते हैं।
*माया कौन है और माया मन से कैसे काम कराती है?*
माया के बारे में समझाते हुए बाबाजी ने फरमाया कि माया पहले भी थी और अन्य लोकों तथा ऊपरी लोकों में भी उसका पसारा है। बिना स्त्री और पुरुष के सृष्टि की रचना नहीं हो सकती थी इसलिए माया को भी बनाया गया। वह अलग-अलग रूपों में रही – प्रकृति के रूप में रही, फिर माया के रूप में आई और उसके बाद आदि शक्ति के रूप में हुई। लोगों ने उसके तरह-तरह के नाम रख दिए लेकिन कुल मिलाकर वह माया ही थी।
ऊपरी लोकों में माया कमजोर थी लेकिन मनुष्य शरीर में वह मजबूत हो गई। इसका कारण यह है कि मन की डोर काल भगवान ने माया के हाथ में दे दी। इस शरीर में मन राजा है। अब माया मन से सब काम कराती है। खाने, देखने, सुनने से लेकर शरीर से बच्चा पैदा कराने तक का काम माया ही मन से कराती है। माया घृणा भी पैदा कराती है और मनुष्य के अंदर यह भावना पैदा करती है कि इनको मार दो, काट दो, इनके साथ मार-काट करो, अत्याचार करो, लूट-पाट कर दो। इसी कारण लोगों का मन चंचल हो रहा है।
*आप माया से छुटकारा दिलाने वाले वक्त के गुरु को भूल जाते हो।*
बाबा उमाकान्त जी महाराज ने कहा कि माया के पर्दे और माया के पसारे में मनुष्य यह भूल जाता है कि उसे माया से छुटकारा कौन दिलाएगा और माया से मुक्ति कौन दिलाएगा। उन्होंने कहा कि मनुष्य उस गुरु को भूल जाता है जो उसकी माया को मुर्दा बना दे। इस धरती के वक्त गुरु, समर्थ गुरु के अंदर सारी शक्ति होती है। उनके अंदर प्रभु की भक्ति और प्रभु की दया होती है। यदि गुरु की भक्ति कर ली जाए तो उसी से सब काम बन जाए लेकिन लोग गुरु को और गुरु की बातों को भूल जाते हैं।
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