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अमेरिका – ईरान समझौता और इजरायल…

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अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप इस समय अपने परंपरागत ‘ अटूट ‘ मित्र इसराइल के हितों को तिलांजलि देकर अमेरिकी हितों के दृष्टिगत ईरान से संबंध सामान्य करते हुए समझौता कर चुके हैं। राष्ट्रपति ट्रंप पर इस समय भीतरी दबाव रहा है। वह जिस प्रकार अपनी सेना को मरवाने के लिए बार-बार इधर-उधर सैनिक अभियानों पर भेजते दिखाई देते रहे हैं उससे अमेरिकावासी भी उनके इस प्रकार के निर्णय से सहमत नहीं रहे हैं। वहां की राजनीति में भी उथल-पुथल है और लोग उनकी जमकर आलोचना कर रहे हैं। जिससे उनकी लोकप्रियता में कमी आई है। माना कि राष्ट्रपति ट्रंप पर अपनी आलोचनाओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, परंतु यह भी सच है कि व्यक्ति आलोचनाओं से भीतर ही भीतर चिंतित अवश्य होता है। विशेष रूप से लोकतंत्र में तो जब आलोचना के कारण व्यक्ति की छवि बिगड़ने लगती है तो अच्छे से अच्छा शासक भी सावधान हो जाता है। संभवतः इन्हीं बातों के दृष्टिगत राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान से चुपचाप समझौता करना अच्छा माना है। ऐसा नहीं है कि केवल अमेरिकी राष्ट्रपति के कारण ही ईरान से अमेरिका के संबंध सामान्य हो रहे हैं । ईरान भी अपनी बर्बादी को अच्छी तरह समझ चुका है। उसने अमेरिका को झूठे दांत दिखाने का परिणाम भुगत लिया है। उसके बड़े नेताओं को मारा गया। उसके बाद ईरान ने अमेरिका को थोड़ा बहुत नुकसान पहुंचाया अवश्य है, परंतु यह वही स्थिति थी जब कोई कमजोर व्यक्ति किसी बड़े पहलवान से लड़ता है तो उसकी पिंडलियां कांपने लगती हैं। प्रतिक्रिया में ईरान ने थोड़ी देर अपनी भभकी दिखाई , वह भी केवल अपने देश के लोगों को यह दिखाने के लिए कि वहां का नेतृत्व भयभीत नहीं है। इसलिए यदि अमेरिका और ईरान एक दूसरे के निकट आ रहे हैं तो दोनों वस्तुस्थिति को समझ कर ऐसा कर रहे हैं। यद्यपि ईरान के मन के भीतर की कसक उसे देर तक पीड़ा देती रहेगी और उसकी चुभन से वह कल को क्या करेगा, कुछ नहीं कह सकते ? इधर अमेरिका में जब तक राष्ट्रपति ट्रंप हैं तब तक अमेरिका की अंतिम नीति रणनीति क्या होगी ? – इस पर भी कुछ नहीं कहा जा सकता।
सारा विश्व इस बात को लेकर हैरान है कि अमेरिका अपने परंपरागत ‘ अटूट मित्र ‘ इसराइल को एक ओर रखकर सीधा ईरान से बातचीत क्यों कर रहा है ? क्या इजराइल का अब कोई अस्तित्व नहीं है ? या इजरायल अमेरिका के इस प्रकार के विश्वासघात को सहन कर लेगा ? ऐसे प्रश्न उस समय और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं जब अमेरिका के लोग और अमेरिका की राजनीति यहूदियों से किसी प्रकार का वैर विरोध लेना नहीं चाहते। वे लोग आज भी इसराइल के प्रति कहीं अधिक झुके हुए दिखाई देते हैं। यह वैसे ही है जैसे भारत में सारा सेक्युलरिस्ट गैंग राजनीति को मुस्लिम तुष्टिकरण की ओर झुकाता हुआ दिखाई देता है। आज भी अमेरिका में इसराइल मूल के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। वहां की राजनीति में उनके वोट बहुत महत्वपूर्ण हैं। हमें तो नहीं लगता कि कोई भी राजनीतिक दल इजरायली मूल के लोगों की वोटों की उपेक्षा करेगा। अपने शासनकाल के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मिस्र के काहिरा में एक सभा में बोलते हुए आतंकवाद के विरुद्ध चल रहे युद्ध में आ रहे खर्च की भरपाई के लिए अरबों और मुसलमानों से संपर्क साधने की बात कही थी। 2009 में दिए गए अपने उपरोक्त भाषण में राष्ट्रपति ओबामा ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि इसराइल के साथ अमेरिका के मजबूत संबंध सर्वविदित हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि ये संबंध अटूट हैं अर्थात चाहे जैसी भी परिस्थिति बनें परंतु अमेरिका इजरायल संबंधों पर किसी प्रकार की आंच नहीं आ सकती।
ऐसा नहीं है कि आज सारा अमेरिका ट्रंप के संकेत पर नाच रहा है, वहां पर बहुत बड़ी संख्या में आज भी पूर्व राष्ट्रपति ओबामा जैसे लोग रहते हैं। बात स्पष्ट है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प इस प्रकार की सोच रखने वाले अपने देश के लोगों की बड़ी संख्या की उपेक्षा नहीं कर सकते। अमेरिकी इसराइल संबंधों की गहराई को समझने वाले राजनीतिक विश्लेषक इस बात को अच्छी प्रकार जानते हैं कि 1962 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने भी संयुक्त राज्य अमेरिका और इजरायल के संबंधों को ‘विशेष संबंध’ की श्रेणी में रखा था। जब 2009 में राष्ट्रपति ओबामा ने अपने ‘ अटूट ‘ मित्र इसराइल को लेकर अपनी उपरोक्त टिप्पणी की थी तो वास्तव में वह टिप्पणी जॉन एफ कैनेडी के ‘ विशेष संबंध ‘ वाले बयान की ही पुष्टि थी। जब कूटनीतिक बयान दिए जाते हैं तो उनके निहित अर्थों को समझने की आवश्यकता होती है । अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने न केवल अपने समर्थक यहूदियों को बल्कि दुनिया के लोगों को भी यह संकेत दे दिया था कि अमेरिका अपनी इसराइल संबंधी परंपरागत नीति से पीछे हटने वाला नहीं है।
जॉन एफ कैनेडी, राष्ट्रपति ओबामा और इसराइल को लेकर अमेरिका की परंपरागत नीति की उपेक्षा करके यदि वर्तमान राष्ट्रपति ट्रंप इसराइल को दरकिनार कर रहे हैं तो यह उनकी सबसे बड़ी भूल होगी। ऐसा करके वह कभी विश्व शांति स्थापित नहीं कर पाएंगे। इससे वह न केवल अपने एक विश्वसनीय मित्र को खो देंगे बल्कि उनके ऐसा करने से अंतरराष्ट्रीय जगत में अमेरिका की विश्वसनीयता भी भंग हो जाएगी। इसके अतिरिक्त यदि कल को इस्लामी जगत के कुछ देशों ने मिलकर इजराइल का नाश कर दिया तो इसका कलंक भी अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के ऊपर लगेगा। अंतरराष्ट्रीय जगत में अपनी इस प्रकार की किरकिरी कराने के लिए अमेरिका के लोग और वहां की राजनीति कदापि तैयार नहीं होगी।
हमें ध्यान रखना चाहिए कि अमेरिका में यहूदियों की जनसंख्या लगभग 70 से 75 लाख है। इससे स्पष्ट होता है कि अमेरिका के मतदान को प्रभावित करने की क्षमता यहूदियों के पास है। अमेरिका में जितने यहूदी लोग रहते हैं लगभग उतनी ही आबादी यहूदियों की इजराइल में है और इसराइल के लोगों के बारे में यह सर्व सामान्य सत्य है कि ये लोग जहां भी होते हैं वहीं अपनी देशभक्ति की छाप छोड़ते हैं। सारे विश्व के लोग जानते हैं कि अपनी मातृभूमि के प्रति समर्पण को लेकर यहूदियों का कोई तोड़ नहीं है। अमेरिका भी इस सत्य को भली प्रकार जानता है। अपनी मातृभूमि के प्रति समर्पण और यहूदियों के इजराइल में अच्छी खासी संख्या में होने के कारण ही इसराइल के राष्ट्रपति नेतन्याहू ने अमेरिका और ईरान के समझौते पर असहमति दिखाई है।
उपरोक्त तथ्यों का यदि निष्पक्ष होकर परीक्षण किया जाए तो पता चलता है कि राष्ट्रपति नेतन्याहू की असहमति में बल है। अमेरिका ने भले ही ईरान के साथ समझौता कर लिया हो और इस समझौते पर इसराइल ने हस्ताक्षर भी न किए हों तो भी इस समझौते में इजरायल मजबूती के साथ कहीं खड़ा हुआ दिखाई देता है यानी समझौते पर उसकी उपस्थिति की छाया है, जिसे ईरान भी उपेक्षित नहीं कर पाएगा।

(डॉ राकेश कुमार आर्य)
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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