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प्रारब्ध की पीड़ा….

जेडी न्यूज़ विज़न…

…..प्रारब्ध की पीड़ा….

कैसे सहन करें अब हम
प्रारब्ध की पीड़ा …
न ही राधा मिली न ही मिली मीरा..
सोचते रह गए पूरा जीवन..
कभी तो होगी तलाश पूरी..
पर मिला नहीं कुछ भी
तलाश रह गई अधूरी…
ये ज़िंदगी भी क्या ज़िंदगी है..
खुशी से ज्यादा जहां मिले गम…
अब क्या ही उम्मीद करें जब ज़िंदगी बची है बहुत ही कम…
पर वो उम्मीद जो बरसों से दबी हुई है सीने में..
अब तो ज्यादा ही उफान पर आ गई…
सोच सोच कर ये सब बातें सब पुरानी याद आ गई…
आज़ फिर दबी हुई चिंगारी हवा बन गई..

यह जिंदगी है देखो अब तप्त तवा बन गयी….

आर डी बाजपेई
एक बेहाल…

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