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पंचकूला में हुई इतिहास संगोष्ठी में लिया गया निर्णय : इतिहास बोध और शत्रुबोध करना इतिहास लेखन की हो प्राथमिकता…

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पंचकूला : :  पंचकूला में हुई राष्ट्रीय इतिहास संगोष्ठी में इतिहास बोध और शत्रुबोध कराने वाले इतिहास लेखन को आज के परिवेश में सर्वोच्च प्राथमिकता देने के बिंदु पर सभी विद्वानों ने सहमति जताई है। देश के नामचीन इतिहास विशेषज्ञों की हुई इस बैठक में निर्णय लिया गया कि जिन लोगों ने भारत के इतिहास का विकृतिकरण करने और इतिहास के माध्यम से गलत तथ्यों को परोसने का कार्य किया है, वे भारत के शत्रु इतिहास लेखक हैं। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन लोगों ने मुस्लिम काल से लेकर आज तक भारत के प्रति शत्रुता का भाव रखते हुए इतिहास लेखन किया वही हमारे लिए प्रेरणा के स्रोत हो गए। जबकि संसार के सभी देशों में अपना इतिहास लोगों ने अपने आप लिखने का कार्य किया है। सभी विद्वान इस बात पर सहमत और एकमत रहे कि आज इतिहास को प्रमाणिक आधार पर भारतीय दृष्टिकोण से लिखने की आवश्यकता है।
इतिहास की इस संगोष्ठी का आयोजन राष्ट्रीय सेवा शिक्षण संस्थान हिमाचल प्रदेश द्वारा किया गया। जिसे राष्ट्रीय पंचनद शोध संस्थान के सौजन्य से संपन्न किया गया। इस अवसर पर सुप्रसिद्ध विद्वान वैद्य राजेश कपूर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हमें बौद्धिक क्षेत्र में एक नवीन क्रांति करने के लिए तैयार रहना होगा। जिसका उद्देश्य भारत के इतिहास के विकृतिकरण की प्रक्रिया को शुद्ध करना और लोगों के भीतर आत्मविश्वास का भाव जगाना होगा। उन्होंने कहा कि भारत के सांस्कृतिक आध्यात्मिक राष्ट्रवाद के विषय को यूरोप के दूषित चिंतन ने जिस प्रकार विकृत किया है उस पर और बड़े स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है।
सुप्रसिद्ध इतिहास लेखक और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता डॉ राकेश कुमार आर्य ने इस अवसर पर इतिहास का महत्व विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इतिहास अतीत के कृत्यों का क्रमबद्ध विवेचन करता है, परंतु भारतीय इतिहास के संदर्भ में यह नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यहां पर भारत के इतिहास की क्रमबद्धता को लोगों ने जानबूझकर तोड़ दिया है। यदि इतिहास की क्रमबद्धता स्पष्ट हो जाए तो इतिहास का महत्व अपने आप समझ में आ जाएगा।
उन्होंने कहा कि इतिहास मानव के उत्थान पतन की सच्ची घटनाओं का और उसके आध्यात्मिक, आर्थिक, सामाजिक क्षेत्र में की गई प्रगति का सच्चा लेखा-जोखा है । यह केवल राजनीतिक हत्याओं के दौर को उल्लेखित कर देने मात्र की घटनाओं पर केंद्रित नहीं रहता। जब देश के लोग अपने इतिहास की सच्चाई को समझेंगे तो उसका महत्व समझ में आएगा और हम अपने धर्म, अपनी संस्कृति, अपने राष्ट्र के प्रति और अत्यधिक समर्पित होकर काम करने लगेंगे। तब यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि हमें अपने वैदिक धर्म को सर्वोच्च क्यों मानना चाहिए ? इतिहास का महत्व समझते ही देश की अनेक समस्याओं का समाधान हो जाएगा। जिनमें धर्मांतरण जैसी एक बीमारी का अंत होना भी सम्मिलित है। डॉ आर्य ने कहा कि जितना हमें वेद पढ़ना आवश्यक है, उतना ही अपना सच्चा इतिहास पढ़ना आवश्यक मानना चाहिए।
डॉ महेंद्र सिंह और डॉ कृष्ण गोपाल ने भी अपने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हमें अपने इतिहास के प्रति अपने दायित्व का निर्धारण कर अपने आप से ही पूछना होगा कि हम वर्तमान में क्या बेहतर कर सकते हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ बी के कोठियाला ने अपने भाषण में कहा कि इतिहास हमारे तप, त्याग और परिश्रम की कहानी होता है। इसलिए आज भी हमें इतिहास के शुद्ध लेखन के लिए तप त्याग और परिश्रम करने की आवश्यकता है। जिसके लिए इस प्रकार की संगोष्ठियों का यह शुभारंभ है जिसमें केवल और केवल अपने लक्ष्य पर दृष्टि रखते हुए काम करने के प्रति हम संकल्पित हो रहे हैं।
इस बैठक में प्रमुख रूप से डॉ आनंद अंजनी झा, प्रेमपाल सिंह, प्रवीण भाण, सुभाष चंद्र सकलानी, संजय अग्रवाल मानसी गांधी, राजकुमार, अश्विनी कुमार राय, मेजर वीर सिंह आर्य, नारायण सिंह, डॉ संजय जिंदल, डॉ गौरव विग,
नरेंद्र कुमार बिश्नोई, अमित कुमार, चैतन्य, गौरव गोयल, अश्विनी कुमार अग्रवाल जैसे विद्वानों की उपस्थिति रही।
कार्यक्रम के बारे में जानकारी देते हुए वैद्य राजेश कपूर ने हमें बताया कि आगामी महीनों में भी इसी प्रकार के कार्यक्रमों के माध्यम से नवीन क्रांति का सूत्रपात करने के लिए यह रथ निरंतर आगे बढ़ता रहेगा। उन्होंने बताया कि पूरे देश में पहले इस प्रकार के लोगों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया जाएगा जो किसी न किसी प्रकार से इस वैचारिक क्रांति में सहभागी होने की इच्छा रखते हैं। उसके उपरांत विधिवत राष्ट्रीय स्तर पर इसकी कार्य योजना को लागू किया जाएगा।

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